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गरीबो एवं मजलूमो के लिए स्वतंत्रता आज बेमानी

किसान व गरीब बेबस, दो वक्त की रोटी भी मुश्किल
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। कल आजादी की 75वीं वर्षगाठ मनाने की तैयारी है। हम इस कदर संवेदनहीन हो गए है कि 15 अगस्त के दिन गरीब एवं मजलूम याद नहीं आते है। जिन्हे दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं हो पा रहा है। कोरोना महामारी ने अधिकांश गरीबो की कमर तोड़कर रख दिया है। बेतहाशा बढ़ी महंगाई के कारण गरीबो एवं किसानो को पेट पालना मुश्किल हो गया है। जिले में सैकड़ो लोग ऐसे भी है जिनके पास छत भी नहीं है। उन्हे यह भी नहीं मालुम कि आजादी होती क्या है। आजाद भारत का मतलब क्या है। आजाद भारत की खुशहाली की बानगी देखनी हो तो रात में 12 बजे के बाद शहर में घूमे। दूसरो के चबूतरे पर, पेड़ो के नीचे, किसी के दालान में, कही फुटपाथ पर तमाम लोग अपने परिवारो के साथ सोते हुए मिल जाएंगे। पिचके पेट व गालो के साथ गहरी नींद में सोते इन नागरिको को देखकर साफ पता लगता है कि रात में भर पेट भोजन नहीं किया। गृहस्थी के नाम पर छोटी सी पोटली और गंदी चादर के अलावा उनके पास कुछ नहीं। भारत के यह वे नागरिक है जिन्हे शिक्षा, काम, भोजन का संविधान में अधिकार मिला है। ऐसे लोगो को आजादी क्या समझ में आएगी जो अपने बच्चो का पेट भरने के लिए भीख मांगने को मजबूर है। वैसे देखा जाए तो कोरोना महामारी ने मध्यम वर्ग को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है। लाकडाउन के दौरान तमाम लोग बेरोजगार हो गए है। शिक्षा जगत से जुड़े लोगो की समस्या अधिक बढ़ गई है। सरकार ने भी कोरोना महामारी एवं लाकडाउन से परेशान मध्यम वर्ग को मदद के नाम पर कुछ नहीं दिया है। प्राइवेट स्कूलो में शिक्षण कार्य करने वाले लोगो को भीषण आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। सरकार ने प्राइवेट शिक्षको की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है। महंगाई भी चरम पर पहुंच गई है। सरकार महंगाई पर कोई नियंत्रण नहीं कर पा रही है। इससे प्राइवेट शिक्षक पूरी तरह से त्रस्त हो चुके है। उधर नियम व कानून ताकतवर की जेब में चला गया है। सरकार योजनाएं तो अवश्य बनाती है परन्तु उसे जिस रूप में क्रियान्वयन किया जाता है वहां इस कदर भ्रष्टाचार है कि गरीबो को किसी भी चीज का लाभ नहीं मिल पाता। गरीबो को काम का अधिकार देने वाली योजना मनरेगा जैसी योजनाओ के क्रियान्वयन में निचले स्तर का भ्रष्टाचार हाबी है। ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक बीडीओ से लेकर उच्च अधिकारियो तक गरीबो को कही सुनवाई नहीं है। शिक्षा के अधिकार के तहत बड़े स्कूलो में सीटे गरीबो को देने के लिए कानून है मगर वे इसे क्रियान्वित नहीं करते है।

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किसान व गरीब बेबस, दो वक्त की रोटी भी मुश्किल
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। कल आजादी की 75वीं वर्षगाठ मनाने की तैयारी है। हम इस कदर संवेदनहीन हो गए है कि 15 अगस्त के दिन गरीब एवं मजलूम याद नहीं आते है। जिन्हे दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं हो पा रहा है। कोरोना महामारी ने अधिकांश गरीबो की कमर तोड़कर रख दिया है। बेतहाशा बढ़ी महंगाई के कारण गरीबो एवं किसानो को पेट पालना मुश्किल हो गया है। जिले में सैकड़ो लोग ऐसे भी है जिनके पास छत भी नहीं है। उन्हे यह भी नहीं मालुम कि आजादी होती क्या है। आजाद भारत का मतलब क्या है। आजाद भारत की खुशहाली की बानगी देखनी हो तो रात में 12 बजे के बाद शहर में घूमे। दूसरो के चबूतरे पर, पेड़ो के नीचे, किसी के दालान में, कही फुटपाथ पर तमाम लोग अपने परिवारो के साथ सोते हुए मिल जाएंगे। पिचके पेट व गालो के साथ गहरी नींद में सोते इन नागरिको को देखकर साफ पता लगता है कि रात में भर पेट भोजन नहीं किया। गृहस्थी के नाम पर छोटी सी पोटली और गंदी चादर के अलावा उनके पास कुछ नहीं। भारत के यह वे नागरिक है जिन्हे शिक्षा, काम, भोजन का संविधान में अधिकार मिला है। ऐसे लोगो को आजादी क्या समझ में आएगी जो अपने बच्चो का पेट भरने के लिए भीख मांगने को मजबूर है। वैसे देखा जाए तो कोरोना महामारी ने मध्यम वर्ग को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है। लाकडाउन के दौरान तमाम लोग बेरोजगार हो गए है। शिक्षा जगत से जुड़े लोगो की समस्या अधिक बढ़ गई है। सरकार ने भी कोरोना महामारी एवं लाकडाउन से परेशान मध्यम वर्ग को मदद के नाम पर कुछ नहीं दिया है। प्राइवेट स्कूलो में शिक्षण कार्य करने वाले लोगो को भीषण आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। सरकार ने प्राइवेट शिक्षको की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है। महंगाई भी चरम पर पहुंच गई है। सरकार महंगाई पर कोई नियंत्रण नहीं कर पा रही है। इससे प्राइवेट शिक्षक पूरी तरह से त्रस्त हो चुके है। उधर नियम व कानून ताकतवर की जेब में चला गया है। सरकार योजनाएं तो अवश्य बनाती है परन्तु उसे जिस रूप में क्रियान्वयन किया जाता है वहां इस कदर भ्रष्टाचार है कि गरीबो को किसी भी चीज का लाभ नहीं मिल पाता। गरीबो को काम का अधिकार देने वाली योजना मनरेगा जैसी योजनाओ के क्रियान्वयन में निचले स्तर का भ्रष्टाचार हाबी है। ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक बीडीओ से लेकर उच्च अधिकारियो तक गरीबो को कही सुनवाई नहीं है। शिक्षा के अधिकार के तहत बड़े स्कूलो में सीटे गरीबो को देने के लिए कानून है मगर वे इसे क्रियान्वित नहीं करते है।

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