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जस्टिस गवई का साहसिक निर्णय और न्यायपालिका में नई शुरुआत”

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार: न्यायपालिका में जस्टिस गवई की ऐतिहासिक पहल

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, भारत की न्यायपालिका में एक नई और ऐतिहासिक पहल की शुरुआत हुई है, जब देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने यह ऐलान किया कि वे रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे। इस साहसिक निर्णय ने सिर्फ न्यायपालिका की गरिमा को नया सम्मान दिया है, बल्कि जनता के मन में भरोसे की उस डोर को भी मजबूत किया है जो पिछले कुछ समय से कई घटनाओं के चलते कमजोर होती जा रही थी।

निष्पक्षता की मिसाल बना न्यायिक फैसला

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि यूनाइटेड किंगडम में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में जस्टिस गवई ने कहा कि उनके कुछ अन्य साथी न्यायाधीशों ने भी यह संकल्प लिया है कि वे सेवानिवृत्ति के बाद किसी सरकारी पद या राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं रखेंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

पूर्व CJI रंजन गोगोई द्वारा राज्यसभा में नामांकन, और जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय का भाजपा में शामिल होना ऐसी घटनाएं हैं, जो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार इस ओर ध्यान आकर्षित करते हैं कि जस्टिस गवई ने कहा, “न्यायपालिका को केवल न्याय करना नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा भी दिखना चाहिए कि वह पूरी तरह निष्पक्ष और ईमानदार है।”

कॉलेजियम प्रणाली और पारदर्शिता की मांग

जस्टिस गवई की आलोचना कॉलेजियम प्रणाली की अपारदर्शिता को लेकर भी सामने आई, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुधारों के नाम पर सरकार को जजों की नियुक्तियों पर नियंत्रण नहीं मिलना चाहिए।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार इस बात को रेखांकित करते हैं कि न्यायपालिका और सरकार के बीच का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग संबंधी टिप्पणी और केंद्र सरकार द्वारा पारित कानून इस टकराव को और गहरा करते हैं।

न्यायिक छवि और विश्वास का सवाल

वे यह भी लिखते हैं कि न्यायपालिका को अब अपने कार्यों के साथ-साथ अपनी छवि को भी निष्पक्ष बनाए रखने की ज़रूरत है। जजों की संपत्ति सार्वजनिक करना, पारदर्शिता बढ़ाना और नैतिक प्रतिबद्धता अपनाना आज के समय की मांग है।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार अंत में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जस्टिस गवई का निर्णय अगर परंपरा बन जाए तो यह भारत की न्यायिक व्यवस्था को एक नई दिशा दे सकता है। यह निर्णय दर्शाता है कि आज भी ऐसे लोग हैं जो पद की गरिमा के साथ-साथ लोकतंत्र की रक्षा के लिए भी खड़े हैं।

 

 

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अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार: न्यायपालिका में जस्टिस गवई की ऐतिहासिक पहल

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, भारत की न्यायपालिका में एक नई और ऐतिहासिक पहल की शुरुआत हुई है, जब देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने यह ऐलान किया कि वे रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे। इस साहसिक निर्णय ने सिर्फ न्यायपालिका की गरिमा को नया सम्मान दिया है, बल्कि जनता के मन में भरोसे की उस डोर को भी मजबूत किया है जो पिछले कुछ समय से कई घटनाओं के चलते कमजोर होती जा रही थी।

निष्पक्षता की मिसाल बना न्यायिक फैसला

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि यूनाइटेड किंगडम में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में जस्टिस गवई ने कहा कि उनके कुछ अन्य साथी न्यायाधीशों ने भी यह संकल्प लिया है कि वे सेवानिवृत्ति के बाद किसी सरकारी पद या राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं रखेंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

पूर्व CJI रंजन गोगोई द्वारा राज्यसभा में नामांकन, और जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय का भाजपा में शामिल होना ऐसी घटनाएं हैं, जो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार इस ओर ध्यान आकर्षित करते हैं कि जस्टिस गवई ने कहा, “न्यायपालिका को केवल न्याय करना नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा भी दिखना चाहिए कि वह पूरी तरह निष्पक्ष और ईमानदार है।”

कॉलेजियम प्रणाली और पारदर्शिता की मांग

जस्टिस गवई की आलोचना कॉलेजियम प्रणाली की अपारदर्शिता को लेकर भी सामने आई, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुधारों के नाम पर सरकार को जजों की नियुक्तियों पर नियंत्रण नहीं मिलना चाहिए।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार इस बात को रेखांकित करते हैं कि न्यायपालिका और सरकार के बीच का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग संबंधी टिप्पणी और केंद्र सरकार द्वारा पारित कानून इस टकराव को और गहरा करते हैं।

न्यायिक छवि और विश्वास का सवाल

वे यह भी लिखते हैं कि न्यायपालिका को अब अपने कार्यों के साथ-साथ अपनी छवि को भी निष्पक्ष बनाए रखने की ज़रूरत है। जजों की संपत्ति सार्वजनिक करना, पारदर्शिता बढ़ाना और नैतिक प्रतिबद्धता अपनाना आज के समय की मांग है।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार अंत में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जस्टिस गवई का निर्णय अगर परंपरा बन जाए तो यह भारत की न्यायिक व्यवस्था को एक नई दिशा दे सकता है। यह निर्णय दर्शाता है कि आज भी ऐसे लोग हैं जो पद की गरिमा के साथ-साथ लोकतंत्र की रक्षा के लिए भी खड़े हैं।