
भाटापारा। भाटापारा शहर की दोनों सरकारी शराब दुकानों में ओवर रेट शराब बिकने की काफी समय से लगातार शिकायत मिल रही है। जिसको लेकर शराब दुकान के बाहर पंडाल लगाकर धरना प्रदर्शन भी हो चुका है। उसके उपरांत भी ओवर रेट में शराब बिक्री में कोई कमी नजर नहीं आ रही है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार रहते कांग्रेसियों द्वारा ओवर रेट के लिए धरना प्रदर्शन, वहीं कांग्रेस के भाटापारा ब्लॉक अध्यक्ष द्वारा ओवर रेट की शिकायत पर अपना नंबर जारी कर शिकायत करने की बात कहना,इस भ्रष्टाचार की गंभीरता को दर्शाताहैं। प्रतिदिन हजारों रुपए की ओवर रेट की कमाई का हिस्सा किन-किन लोगों में बट रहा है? आम जनता के लिए समझना मुश्किल नहीं होगा! जिले के बड़े प्रशासनिक अधिकारी,आबकारी विभाग के अधिकारी, क्षेत्र के विपक्ष के नेताओ तथा सत्ता पक्ष के नेताओं सभी की मौन सहमति ओवर रेट के भ्रष्टाचार को और बढ़ावा दे रही है। ₹10 से लेकर ₹300 तक शराब में अधिक मूल्य वसूला जा रहा है। दोनों सरकारी दुकानों के बाहर सरकार की मूल्य सूची नदारद रहती है। जिससे ग्राहकों को उचित मूल्य का पता ही नहीं चल पाता है। वही वर्षों से जमे कर्मचारियों से मिलीभगत के चलते उनका ट्रांसफर नहीं होना। इस बात को स्पष्ट साबित करता है कि बड़े पैमाने पर सभी की मौन सहमति है।

भाटापारा। भाटापारा शहर की दोनों सरकारी शराब दुकानों में ओवर रेट शराब बिकने की काफी समय से लगातार शिकायत मिल रही है। जिसको लेकर शराब दुकान के बाहर पंडाल लगाकर धरना प्रदर्शन भी हो चुका है। उसके उपरांत भी ओवर रेट में शराब बिक्री में कोई कमी नजर नहीं आ रही है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार रहते कांग्रेसियों द्वारा ओवर रेट के लिए धरना प्रदर्शन, वहीं कांग्रेस के भाटापारा ब्लॉक अध्यक्ष द्वारा ओवर रेट की शिकायत पर अपना नंबर जारी कर शिकायत करने की बात कहना,इस भ्रष्टाचार की गंभीरता को दर्शाताहैं। प्रतिदिन हजारों रुपए की ओवर रेट की कमाई का हिस्सा किन-किन लोगों में बट रहा है? आम जनता के लिए समझना मुश्किल नहीं होगा! जिले के बड़े प्रशासनिक अधिकारी,आबकारी विभाग के अधिकारी, क्षेत्र के विपक्ष के नेताओ तथा सत्ता पक्ष के नेताओं सभी की मौन सहमति ओवर रेट के भ्रष्टाचार को और बढ़ावा दे रही है। ₹10 से लेकर ₹300 तक शराब में अधिक मूल्य वसूला जा रहा है। दोनों सरकारी दुकानों के बाहर सरकार की मूल्य सूची नदारद रहती है। जिससे ग्राहकों को उचित मूल्य का पता ही नहीं चल पाता है। वही वर्षों से जमे कर्मचारियों से मिलीभगत के चलते उनका ट्रांसफर नहीं होना। इस बात को स्पष्ट साबित करता है कि बड़े पैमाने पर सभी की मौन सहमति है।



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