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नौ वर्ष में मकानों से पट गया कछार

दोनों नदियों के किनारे तक लगातार जारी है अवैध प्लाटिंग
प्रयागराज। पहले 1978 और उसके बाद 2013 में आई विध्वंसक बाढ़ से जिला प्रशासन और स्थानीय लोगों ने कोई सबक नहीं लिया। कछारी इलाकों में बेतहाशा मकान बनते गए। नतीजा यह हुआ कि नदियों के पेटा तक अवैध प्लाटिंग हो गई और लोगों ने बड़े बड़े मकान बनवा लिए लेकिन जिला प्रशासन ने इस पर रोक लगाने के लिए जरा भी सख्ती नहीं की। नौ वर्ष पहले बाढ़ दौरान हजारों मकान और उसमें रहने वाले लोग प्रभावित हुए तो जिला प्रशासन से इसके खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए बड़े बड़े दावे किए थे। अफसरों ने अवैध प्लाटिंग रोकने और मकानों न बनने देने तक की बात की थी, लेकिन बाढ़ खत्म होने के बाद सभी दावों की हवा निकल गई।। इसी का नतीजा है कि नौ वर्ष में दोनों नदियों का कछारी इलाका मकानों से पट गया। वर्ष 2013 तक इन इलाकों  जहां दो-तीन हजार मकान थे, वहीं यह संख्या अब करीब 20 हजार के पार पहुंच गई है। कछारी इलाकों में अवैध प्लाटिंग भी जमीन के मालिक और तहसील एवं विकास प्राधिकरण के कर्मचारियों की मिलीभगत से ही हो रही। यह काम बदस्तूर जारी है। इन इलाकों में जमीन की कीमत कम होने के कारण लोग यह सोचकर भी उसे खरीदकर मकान बनवा लेते हैं कि बाढ़ के दौरान एक माह संकट भी झेल लेंगे।

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दोनों नदियों के किनारे तक लगातार जारी है अवैध प्लाटिंग
प्रयागराज। पहले 1978 और उसके बाद 2013 में आई विध्वंसक बाढ़ से जिला प्रशासन और स्थानीय लोगों ने कोई सबक नहीं लिया। कछारी इलाकों में बेतहाशा मकान बनते गए। नतीजा यह हुआ कि नदियों के पेटा तक अवैध प्लाटिंग हो गई और लोगों ने बड़े बड़े मकान बनवा लिए लेकिन जिला प्रशासन ने इस पर रोक लगाने के लिए जरा भी सख्ती नहीं की। नौ वर्ष पहले बाढ़ दौरान हजारों मकान और उसमें रहने वाले लोग प्रभावित हुए तो जिला प्रशासन से इसके खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए बड़े बड़े दावे किए थे। अफसरों ने अवैध प्लाटिंग रोकने और मकानों न बनने देने तक की बात की थी, लेकिन बाढ़ खत्म होने के बाद सभी दावों की हवा निकल गई।। इसी का नतीजा है कि नौ वर्ष में दोनों नदियों का कछारी इलाका मकानों से पट गया। वर्ष 2013 तक इन इलाकों  जहां दो-तीन हजार मकान थे, वहीं यह संख्या अब करीब 20 हजार के पार पहुंच गई है। कछारी इलाकों में अवैध प्लाटिंग भी जमीन के मालिक और तहसील एवं विकास प्राधिकरण के कर्मचारियों की मिलीभगत से ही हो रही। यह काम बदस्तूर जारी है। इन इलाकों में जमीन की कीमत कम होने के कारण लोग यह सोचकर भी उसे खरीदकर मकान बनवा लेते हैं कि बाढ़ के दौरान एक माह संकट भी झेल लेंगे।

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