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बहुता पुराना है ताजियादारी का इतिहास

आई नवीं मुहर्रम की रात ताजिये रखे गए चौक पर
लोकमित्र ब्यूरो
फूलपुर (प्रयागराज)। मुहर्रम का चांद दिखते ही मुसलमानों का जहां माहे मोहर्रम शुरू हो जाता है। वही तत्कालीन बादशाह यजीद के बुलाने पर हुसैन अपने कई हजार अनुयायिओं को कर्बला साथ लेकर चल दिए। जहां बादशाह यजीद ने हुसैनी घराने पर तरह-तरह के जुल्म ढाने शुरू कर दिए।  यजीदी फौजों ने हजरत इमाम हुसैन को बैयत करने के लिए दबाव बनाया। परंतु उन्होंने यजीद की बैयत से इनकार कर दिया। तभी कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन के घराने पर पानी बंद कर दिया गया । खाने के लाले पड़ गए। परंतु इमाम हुसैन ने सत्य और अपने नाना के दीन का रास्ता नहीं छोड़ा। अंततः नवीं मोहर्रम की रात आई इस रात इमाम ने अपने तमाम साथियों को बुलाकर के बताया कि अब जंग लाजिमी है। जिसको मेरे साथ रहना है। जो ना रुकना चाहे चला जाए। बस क्या था काफी लोग खिसक लिए। केवल 72 लोग ही बचे जो हुसैनी लश्कर में रहे। परंतु उस वक्त के जालिम बादशाह से कोई टकरा ना सका। अंततः शासक यजीद से सत्य असत्य की जंग हुई। जिसमें इमाम हुसैन अ0स0 दौरान जंग में शहीद हो गए। उन्हीं के याद में ताजियादारी की जाती है। जिसमें चांद रात से लेकर दसवीं वा ग्यारहवीं मोहर्रम को इमाम की याद में ताजिए रात में चौक पर रखे जाते हैं और निर्धारित रास्तों पर घूम कर नौहा, मर्सिया आदि पढ़कर ताजिए सहित दसवीं मोहर्रम को दोपहर बाद कर्बला में ले जाकर दफन किये जाते है। हजरत इमाम हुसैन ने शहीद होना बेहतर समझा परंतु यजीद की बैयत मानने से इनकार करते रहे। दसवीं मोहर्रम को उनके साथ आए योद्धा तथा स्वयं हुसैन की सहादत हुई।

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आई नवीं मुहर्रम की रात ताजिये रखे गए चौक पर
लोकमित्र ब्यूरो
फूलपुर (प्रयागराज)। मुहर्रम का चांद दिखते ही मुसलमानों का जहां माहे मोहर्रम शुरू हो जाता है। वही तत्कालीन बादशाह यजीद के बुलाने पर हुसैन अपने कई हजार अनुयायिओं को कर्बला साथ लेकर चल दिए। जहां बादशाह यजीद ने हुसैनी घराने पर तरह-तरह के जुल्म ढाने शुरू कर दिए।  यजीदी फौजों ने हजरत इमाम हुसैन को बैयत करने के लिए दबाव बनाया। परंतु उन्होंने यजीद की बैयत से इनकार कर दिया। तभी कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन के घराने पर पानी बंद कर दिया गया । खाने के लाले पड़ गए। परंतु इमाम हुसैन ने सत्य और अपने नाना के दीन का रास्ता नहीं छोड़ा। अंततः नवीं मोहर्रम की रात आई इस रात इमाम ने अपने तमाम साथियों को बुलाकर के बताया कि अब जंग लाजिमी है। जिसको मेरे साथ रहना है। जो ना रुकना चाहे चला जाए। बस क्या था काफी लोग खिसक लिए। केवल 72 लोग ही बचे जो हुसैनी लश्कर में रहे। परंतु उस वक्त के जालिम बादशाह से कोई टकरा ना सका। अंततः शासक यजीद से सत्य असत्य की जंग हुई। जिसमें इमाम हुसैन अ0स0 दौरान जंग में शहीद हो गए। उन्हीं के याद में ताजियादारी की जाती है। जिसमें चांद रात से लेकर दसवीं वा ग्यारहवीं मोहर्रम को इमाम की याद में ताजिए रात में चौक पर रखे जाते हैं और निर्धारित रास्तों पर घूम कर नौहा, मर्सिया आदि पढ़कर ताजिए सहित दसवीं मोहर्रम को दोपहर बाद कर्बला में ले जाकर दफन किये जाते है। हजरत इमाम हुसैन ने शहीद होना बेहतर समझा परंतु यजीद की बैयत मानने से इनकार करते रहे। दसवीं मोहर्रम को उनके साथ आए योद्धा तथा स्वयं हुसैन की सहादत हुई।

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