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सच्चिदानन्द मिश्र
तमाम समीकरणों के बावजूद जिले की तीनों सीटों में सेंध मारने में सफल हो गई सपा!
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चुनाव में भाजपा को वोट दे अदा कर दिया नमक का हक!
2 लाख 99 हजार से अधिक कार्डधारी साबित हुए तुरुप का पत्ता!
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कौशाम्बी। 18वीं विधानसभा के सदस्यों का चुनाव संपन्न होने के बाद राजनीतिक दल चुनावी विश्लेषण में लगे हुए हैं।बड़े जोर-शोर से सूबे की सत्ता में काबिज होने का सपना देखने वाली समाजवादी पार्टी को करारा झटका लगा और वह सत्ता के नजदीक तक नहीं फटक पाई।ऐसा नहीं है कि समाजवादी पार्टी तथा उसके प्रत्याशियों ने चुनाव ठीक ना लड़ा हो।लड़ाई ऐसी रही कि भारतीय जनता पार्टी सहित भाजपा नेताओं की परिणाम आने तक हलक सूखी रही लेकिन जिस आशा-उम्मीद को लगाकर समाजवादी पार्टी बैठी थी उसे निराशा हाथ लगी। ऐसा माना जा रहा है कि पूरे प्रदेश सहित जनपद में नि:शुल्क खाद्यान्न के लाभार्थियों ने भाजपा की जीत में अहम भूमिका अदा की।जनपद की 3 विधानसभा सीटों में 2 लाख 99 हजार से अधिक कार्डधारियों ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर सरकार के नमक का हक अदा करने के लिए वोट डाला। वह बात दीगर है कि इतना सब होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को यहां तीनो सीटों को खोना पड़ा है। हकीकत में विधानसभा चुनाव जनपद ही नहीं पूरे प्रदेश में भाजपा व सपा के बीच केंद्रित होकर रह गया था।एक पर एक हुए चुनाव का ही नतीजा रहा कि भाजपा को पुनःइतनी बड़ी जीत हासिल हुई।समाजवादी पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव से ढाई गुना अधिक सीटें जीतीं और वोट का परसेंटेज भी बढ़ाया लेकिन उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। जिले की सभी सीटों में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों ने भाजपा उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दी।जीत-हार का अंतर भी पिछले चुनाव की अपेक्षा 10गुना से भी अधिक नीचे गिर गया। *या यूं कहा जाए कि सपा व भाजपा के बीच हुई सीधी टक्कर का ही नतीजा रहा कि भारतीय जनता पार्टी की नैया यहां सम्मानजनक नही पार हो पाई। कांग्रेस के प्रत्याशियों का निराशाजनक प्रदर्शन भी भाजपा की जीत का बड़ा कारण उभर कर सामने आया है, लेकिन सबसे अहम रहा कोरोना काल में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई नि:शुल्क खाद्यान योजना।* जिसने भारतीय जनता पार्टी की नैया पार लगा दी तो समाजवादी पार्टी को सत्ता से दूर धकेल दिया। कोरोना काल में रोजी-रोजगार के बाद प्रवासी मजदूरों की हुई घर वापसी से इनके सामने रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो गया था।इन मजदूरों के सामने परिवार का पेट पालने की भी मुसीबत खड़ी हो गई। *जिसे केंद्र व प्रदेश सरकार ने अवसर में बदला और लोगों को नि:शुल्क खाद्यान्न माह में एक बार नहीं बल्कि दो बार देने का काम किया।इतना ही नहीं चुनाव से कुछ माह पहले चना,रिफाइंड आयल तथा नमक ने तो गरीबों के दिल में भारतीय जनता पार्टी के लिए अलख ही जगह दी।* जिले की 3 विधानसभा सीटों में मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करना था, लेकिन यहां पांचवें चरण में 27 फरवरी को हुए मतदान में करीब दो तिहाई मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया। *जिस तरह से मतदान में जाति-धर्म के बंधन तोड़ गरीबों एवं महिलाओं ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया उससे लखनऊ की कुर्सी भाजपा के लिए आसान हो गई।जनपद मे 2 लाख 99 हजारअन्त्योदय कार्डधारकों व पात्र गृहस्थी के कार्डधारकों ने भाजपा के पक्ष में हवा तो बना दी और लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव में इतिहास रचने का भाजपा के लिए तो काम कर दिया,परन्तु जिले में तीनों सीटों पर निराशा हाथ लगी । इसमें कोई दो राय नहीं कि समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों ने शानदार प्रदर्शन किया और इतनी बड़े मतों की सेंधमारी एवं जोड़-गणित के बाद भी मन्झनपुर ,सिराथू, चायल सीटे भाजपा को खोनी पडी। पूरे प्रदेश में भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत के बाद भी जिले की तीनों सीटें खोना भाजपा को बड़ा झटका दे गया। चुनावी समीकरणों को दरकिनार कर भारतीय जनता पार्टी की 3 सीटों में सपा प्रत्याशियों की जीत ने कई ऐसे अनसुलझे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका आत्ममंथन कर भाजपा नेतृत्व को ही उसका तोड़ निकालना होगा।अन्यथा लोकसभा चुनाव में सरकार किसी की भी बने लेकिन जिले में खतरे की घंटी बज चुकी है !



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