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होली की तैयारियां शुरू, सजने लगी दुकाने

मौसम: फिजा में बही फागुनी बयार
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। फिजा में फागुनी बयार बहनी शुरू हो गई है। सुबह से ही होने वाली कड़ी धूप मौसम में परिवर्तन का अहसास करा रही है। शहरी व ग्रामीण अंचलो में होली पर्व की तैयारियां भी शुरू हो गई है। अबीर गुलाल, रंग पिचकारी व अन्य खाद्य पदार्थो की दुकाने सजने लगी है। साथ ही बड़े बूढ़ो एवं युवाओं सबके चेहरो पर होली का उल्लास भी दिखने लगा है। ग्रामीण इलाको के साथ ही शहरी क्षेत्रो में भी बसंत पंचमी पर्व से होलिका सजाने की तैयारी शुरू हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रो में रेड़ी का पेड़ गाड़कर होलिका की शुरूआत कर दी जाती है। साथ ही होली के लिए लकड़ियां भी एकत्र करना शुरू हो जाता है। वही महाशिवरात्रि पर्व के बाद से होली की तैयारी भी घरो में महिलाएं शुरू कर देती है। महिलाएं पखवारे भर पूर्व से ही आलू के चिप्स, पापड़ आदि बनाने में जुट जाती है। इन्हे बनाकर सुखाया जाता है जो होली के दिन आने वाले मेहमानो को परोसा जाता है। घर की साफ सफाई से लेकर नये कपड़ो की खरीददारी तक सबके लिए समय निकालने की जरूरत होती है। इसलिए इस पर्व की तैयारी में महीने भर का समय कैसे बीत जाता है यह पता ही नही चलता। होली का पर्व आने के पूर्व ही मौसम भी अपना मिजाज बदल लेता है। इससे यह महसूस होता है कि जैसे प्रकृति भी होली के रंग में रंग जाने के लिए बेकरार है। बच्चो की टोलियो ने अभी से ही पिचकारी एवं रंगो के लिए पैसे एकत्र करने शुरू कर दिए है। युवाओ को रिझाने के लिए कई कम्पनियो ने रीमिक्स की चाशनी में पिरोकर फागुनी गीतो को परोसा है। कुछ कम्पनियां गांव के श्रोताओ को विशेष रूप से आकर्षित करने के लिए द्विअर्थी भोजपुरी गीतो को भी बाजार में उतार दिया है। वही बड़े बूढ़ो ने होली पर भांग की ठंडई की दावत उड़ाने का मन बनाना शुरू कर दिया है। आलम यह है कि अभी से ही उनके यहां अगर कोई खास मेहमान आ गया तो वह रंग से सराबोर हुए बिना नहीं जा पाता। फिर चाहे उसने बिल्कुल नए कपड़े ही क्यो न पहने हो। होली की यही उल्लास एवं मस्ती इसे अन्य त्योहारो से अलग करती है।

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मौसम: फिजा में बही फागुनी बयार
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। फिजा में फागुनी बयार बहनी शुरू हो गई है। सुबह से ही होने वाली कड़ी धूप मौसम में परिवर्तन का अहसास करा रही है। शहरी व ग्रामीण अंचलो में होली पर्व की तैयारियां भी शुरू हो गई है। अबीर गुलाल, रंग पिचकारी व अन्य खाद्य पदार्थो की दुकाने सजने लगी है। साथ ही बड़े बूढ़ो एवं युवाओं सबके चेहरो पर होली का उल्लास भी दिखने लगा है। ग्रामीण इलाको के साथ ही शहरी क्षेत्रो में भी बसंत पंचमी पर्व से होलिका सजाने की तैयारी शुरू हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रो में रेड़ी का पेड़ गाड़कर होलिका की शुरूआत कर दी जाती है। साथ ही होली के लिए लकड़ियां भी एकत्र करना शुरू हो जाता है। वही महाशिवरात्रि पर्व के बाद से होली की तैयारी भी घरो में महिलाएं शुरू कर देती है। महिलाएं पखवारे भर पूर्व से ही आलू के चिप्स, पापड़ आदि बनाने में जुट जाती है। इन्हे बनाकर सुखाया जाता है जो होली के दिन आने वाले मेहमानो को परोसा जाता है। घर की साफ सफाई से लेकर नये कपड़ो की खरीददारी तक सबके लिए समय निकालने की जरूरत होती है। इसलिए इस पर्व की तैयारी में महीने भर का समय कैसे बीत जाता है यह पता ही नही चलता। होली का पर्व आने के पूर्व ही मौसम भी अपना मिजाज बदल लेता है। इससे यह महसूस होता है कि जैसे प्रकृति भी होली के रंग में रंग जाने के लिए बेकरार है। बच्चो की टोलियो ने अभी से ही पिचकारी एवं रंगो के लिए पैसे एकत्र करने शुरू कर दिए है। युवाओ को रिझाने के लिए कई कम्पनियो ने रीमिक्स की चाशनी में पिरोकर फागुनी गीतो को परोसा है। कुछ कम्पनियां गांव के श्रोताओ को विशेष रूप से आकर्षित करने के लिए द्विअर्थी भोजपुरी गीतो को भी बाजार में उतार दिया है। वही बड़े बूढ़ो ने होली पर भांग की ठंडई की दावत उड़ाने का मन बनाना शुरू कर दिया है। आलम यह है कि अभी से ही उनके यहां अगर कोई खास मेहमान आ गया तो वह रंग से सराबोर हुए बिना नहीं जा पाता। फिर चाहे उसने बिल्कुल नए कपड़े ही क्यो न पहने हो। होली की यही उल्लास एवं मस्ती इसे अन्य त्योहारो से अलग करती है।

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