चुनावी मुद्दा बना अपना मतलब साधते हैं सभी राजनीतिक दल, चुनाव बाद होगी आर-पार की लड़ाई
होलागढ़ (प्रयागराज)। पुरानी पेंशन बहाली प्रकरण पर कर्मचारी अब चुप नहीं रहेंगे। भविष्य में चाहे जिसकी सरकार बने, कर्मचारी आरपार की लड़ाई लड़ेंगे।
विधान सभा चुनाव में NPS अर्थात न्यू पेंशन स्कीम और OPS अर्थात ओल्ड पेंशन स्कीम भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है। होलागढ़ के एक राज्य कर्मचारी की मानें तो कर्मचारी भी इस चुनाव में गुमराह हो गए हैं। राज्य कर्मचारी संगठन आटेवा और शिक्षक सभी सरकारों से पेंशन को अपना अधिकार मानकर मांग रहे हैं। मगर राजनीतिक दल हैं कि इसे चुनावी मुद्दा बनाकर अपना मतलब निकाल रहे हैं। बता दें कि तत्कालीन एनडीए की सरकार यानी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पुरानी पेंशन समाप्त की थी और इसका निर्णय राज्य सरकारों पर छोड दिया था। पश्चिम बंगाल की सरकार ने इस कानून को न मानकर आज तक वहां पुरानी पेंशन बहाल रखा है। जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अटल सरकार के सुर में सुर मिलाकर 1 अप्रैल 2005 से पुरानी पेंशन समाप्त कर नई पेंशन स्कीम लागू कर दी थी। इसके बाद 2007 से लेकर 2012 तक बसपा की सरकार रही। मगर तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने भी अटल सरकार की बात मान राज्य कर्मचारियों की मांग को दरकिनार कर दिया। इसके बाद 2012 से लेकर 2017 तक सपा की सरकार में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। उन्होंने भी पिता की नीति पर चलकर राज्य कर्मचारियों और शिक्षकों की मांग नामंजूर कर आंदोलन को दबाने का प्रयास किया। 2017 में भाजपा सरकार के योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। राज्य कर्मचारियों/शिक्षकों ने पुनः आंदोलन कर पुरानी पेंशन बहाल करने की मांग की। योगी आदित्यनाथ ने 2018 में इस प्रकरण पर विचार करने के लिए एक कमेटी गठित कर दी थी। मगर 3 साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। हालांकि भले ही भाजपा सरकार के ऊपर पुरानी पेंशन बंद करने का दाग क्यों न लगा हो मगर इन कर्मचारियों के पेंशन के लिये यदि किसी सरकार ने कुछ सोचा है तो वह भाजपा ही है। बसपा, सपा और कांग्रेस ने तो केवल राजनीतिक लाभ के लिये सिर्फ नूराकुश्ती ही की। कर्मचारियों का कहना है कि प्रदेश में आगे चाहे जिसकी सरकार बने राज्य कर्मचारी चैन से बैठने नहीं देंगे। सरकार या तो पुरानी पेंशन स्कीम को बहाल करेगी अथवा सांसद, विधायक आदि को भी अपनी पेंशन बंद करने पर मजबूर होना पड़ेगा।



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