मान्यताएं सुरक्षा तो चिकित्सा स्वास्थ्य के लिए उपयोगी पारम्परिक मान्यताओं में छिपा है वैज्ञानिक दृष्टिकोण
अयोध्या। बसन्त के जाते ही रंगों के त्योहार के उल्लास के बीत जाने के साथ मौसम में हुए परिवर्तन (संक्रमण) के साथ यदि शरीर और प्रकृति का समन्वय बिगड़ा तो यह आपकी और बच्चों की सेहत को नुकसान पहुँचा सकता है। पतझड़ के साथ गन्दगी की पर्याप्त सँभवनाये रह जाती है जिससे खाद्य पदार्थों का दूषित होना संभव है और असावधानी में इन्ही दूषित पदार्थों के सेवन से शरीर मे जमा दूषित द्रव्यों की अधिकता से इस मौसम में प्रकृति के सापेक्ष सन्तुलन न बना पाने के कारण चेचक , खसरा या अन्य विषाणुजनित बुखार का खतरा बढ़ गया है। जिनका सबसे ज्यादा शिकार 5 से 15 वर्ष की आयुवर्ग के बच्चे हो रहे हैं। चेचक व खसरा दोनों ही व्यक्ति से व्यक्ति में बहुत तेजी से फैलने वाले संक्रामक रोग हैं जो वैरिसेला प्रजाति का विषाणुओं से होते है। 50 से अधिक आयु वर्ग के बुजुर्गों में भी संभव कुछ अपवादों छोड़ दे तो यह रोग जीवन में दुबारा व्यक्ति को पीड़ित नहीं करता। रोमान्तिका या दुलारी माता सामान्यतः यह रोग 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अधिक होता है। बुखार और बेचैनी के साथ बच्चों रोम कूपों खास कर चेहरे पर महीन से दाने निकलने लगते हैं जिसके कारण इसे रोमान्तिका भी कहा जाता है , और वे 2-3 दिनों के बाद फफोलों का रूप ले लेते हैं तथा इसके बाद कुछ दिनों बाद ये सूख कर झड़ने लगते हैं। चिकनपॉक्स या छोटी माता या शीतला माता):- इस प्रकार की चेचक में शरीर पर मसूर की दाल के बराबर लगभग 5 मिमी के दाने निकलने लगते हैं। इसलिए इसे चेचक का मसूरिका रोग कहते हैं। संक्रमित बच्चे के शरीर के बीच की तरफ वाले हिस्सों जैसे पेट ,पीठ, कन्धे, आदि में लाल आधार वाले छालेनुमा दाने उभरते हैं जिनमे बाद में पस बन जाती है और यही फूटने पर पपड़ी की शक्ल ले लेते हैं। इसके साथ शरीर में तेज दर्द जलनयुक्त पीड़ा या बुखार भी होता है। इस चेचक को ठीक होने में कम से कम 11-12 दिन या अधिक समय भी लग जाता है। इस चेचक के कारण शरीर पर घाव भी हो जाते हैं, जिसके निशान 2 -3 महीने के बाद साफ होते हैं। यह बहुत ज्यादा संक्रामक रोग है। इस रोग के दाने कम से कम 10 दिनों में निकल आते हैं। रोग के लक्षण- रोगी को जुकाम, सर्दी, छींक, खाँसी, बुखार, सिर दर्द , आंखें में पानी, रोशनी से भय, आदि लक्षण दिखाई देते हैं।बुखार के साथ या कभी कभी बुखार के बिना भी 2 दिनों में दाने निकलने लगते हैं। स्मॉल पॉक्स या बड़ी माता – यह चेचक अत्यंत पीड़ा दायी है। बड़े-बड़े फफोलों के आकार के कारण ही बड़ी माता कहते है।जिनके फूटने पर उनसे पानी या कभी-कभी बदबूदार पीब भी निकलती है।इस चेचक के कारण आंखों में फुल्ली पड़ जाने से व्यक्ति अंधा या बहरा भी हो जाता है। जिस व्यक्ति को चेचक के दाने निकलने वाले होते हैं, उसे भूख नहीं लगती, जीभ का स्वाद बिगड़ जाता है, शरीर में सुस्ती, कमजोरी और सिर में भारीपन का अनुभव होने लगता है। व्यक्ति को कब्ज व पीठ में दर्द भी हो सकता है।इसको ठीक होने में ही कम से कम 20 से 30 दिनों का समय लग जाता है तथा त्वचा पर निशान जीवन भर रह सकते हैं। कैसे करें चेचक और खसरे में अंतर डॉ उपेन्द्रमणि त्रिपाठी ने बताया
वैरिसेला जोस्टर प्रजाति के ही विषाणु से एक और बेहद संक्रमक रोग बच्चों में फैलता है जिसे खसरा कहते हैं।जिसमे लाल रंग के छोटे दाने पूरे शरीर में उद्भेद के रूप में फ़ैल जाते हैं। इस रोग का आक्रमण काल 10 दिनों का होता है जिसकी शुरआत सर्दी ,खांसी ,छींक, गला बैठना,आँखों में जलन,पानी और हल्के बुखार जैसे लक्षणों के साथ हो सकती है। इसकी पहचान के सबसे प्रमुख लक्षण के रूप में मुह के अंदर गले की तरफ लालघेरे में सफेद धब्बे का पाया जाना होता है जिसे कॉपलिक्स स्पॉट कहते हैं और यह 95%से अधिक रोगियों में देखा जा सकता है। संक्रमण के चौथे दिन तक यह रोग पूरे शरीर में फ़ैल सकता है और यही रोग की सबसे संक्रामक अवस्था होती है। बचाव व उपचार के क्या हैं उपाय- डॉ उपेन्द्रमणि त्रिपाठी का कहना है कि हमारी पारम्परिक मान्यताओं पर विचार करें तो 10 से 12 दिनों में अपनाई जाने वाली क्रियाएं पूर्वजों के अंधविश्वास की नहीं अपितु वैज्ञानिक दृष्टि का प्रमाण हैं जो रोग की संक्रामकता को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण हैं। रोगी को परिवार के अन्य सदस्यों से अलग साफ स्वच्छ एवं हवादार कमरे में रखना,और आहार के लिए फल या जूस ही देना, 6 या सातवें दिन तेल चढ़ाना या लगाना,जिससे पपड़ी फूटने पर पस से विषाणु फैले नही और खुजली न हो,इसके बाद फिर सामान्य भोजन देने की शुरुआत, वस्तुतः यही क्रम आज भी रोगी को स्वस्थ होने तक अपनाये जाते हैं। इसके साथ ही पीड़ित होने पर पूरे दिन में कई बार पके नारियल का पानी लगा सकते हैं, आंखे न चिपकें इसलिए गुलाब जल या साफ पानी से दिन में 2-3 बार धोकर शुद्ध घी का काजल लगा सकते हैं, अधिकाधिक गुनगुना पानी पिए। रुद्राक्ष को पानी में घिसकर चेचक के रोगी के घावों पर लगाने से उसकी जलन दूर होती है और घाव भी जल्दी ठीक होते हैं।



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