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आरोग्य की बात होम्योपैथी के साथ

कोरोना से बचाव में जरूरी  वायरस से तन की दूरी,  डर से मन की दूरी – डा. उपेन्द्रमणि त्रिपाठी म्यूटेशन की प्रक्रिया से वायरस बनाता है नए और प्रभावी वेरिएंट
अयोध्या। कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रोन की संक्रामकता ने विश्वमानवता के सामने पुनः एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। विश्व की दूसरी बड़ी जनसंख्या होने पर भी भारत में रिकार्ड वैक्सीनेशन के बावजूद बढ़ते संक्रमण के आंकड़े,भारत मे कई राज्यों में घोषित चुनाव के मद्देनजर भविष्य की चिंता का विषय है। उक्त सामयिक विषय पर विगत कोरोनकाल में होलिस्टिक टेलिकन्सल्टेशन सेवा का संचालन कर चुके होम्योपैथी फ़ॉर ऑल के चिकित्सक डा. उपेन्द्रमणि त्रिपाठी ने “आरोग्य की बात होम्योपैथी” के साथ अभियान अंतर्गत जानकारी देते हुए कहा कि वैक्सीन लगवा चुके लोग यह मानकर निश्चिंत हो कि वे पूर्णता सुरक्षित हैं, और बचे लोगों में अभी तक न लगवा पाने के बीच पुनः संक्रमण का भय होने, या संक्रमण को केवल सर्दी जुकाम की तरह कम खतरनाक मानकर निश्चिंतता का भाव और इस प्रकार कुल मिलाकर लापरवाही निश्चित रूप से भविष्य के खतरे का संकेत हो सकती है। डा त्रिपाठी ने तर्क दिया कि स्वयं को प्रभावी बनाये रखने के लिए विषाणु में स्वभावतः समय के साथ जेनेटिक मैटेरियल में परिवर्तन या म्यूटेशन के जरिये नए वैरिएंट बनाने का गुण पाया जाता है, इसलिए हो सकता है कि एक समय कम खतरनाक किन्तु अधिक संक्रामक वेरिएंट के प्रभाव से हम निश्चिंत हो जाएं किन्तु संभव है उसके बाद उसका कोई प्रभावी म्यूटेशन अधिक खतरनाक रूप में सामने आ जाये, इसलिए कम से कम छः माह तक हमे अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए और कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए।

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कोरोना से बचाव में जरूरी  वायरस से तन की दूरी,  डर से मन की दूरी – डा. उपेन्द्रमणि त्रिपाठी म्यूटेशन की प्रक्रिया से वायरस बनाता है नए और प्रभावी वेरिएंट
अयोध्या। कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रोन की संक्रामकता ने विश्वमानवता के सामने पुनः एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। विश्व की दूसरी बड़ी जनसंख्या होने पर भी भारत में रिकार्ड वैक्सीनेशन के बावजूद बढ़ते संक्रमण के आंकड़े,भारत मे कई राज्यों में घोषित चुनाव के मद्देनजर भविष्य की चिंता का विषय है। उक्त सामयिक विषय पर विगत कोरोनकाल में होलिस्टिक टेलिकन्सल्टेशन सेवा का संचालन कर चुके होम्योपैथी फ़ॉर ऑल के चिकित्सक डा. उपेन्द्रमणि त्रिपाठी ने “आरोग्य की बात होम्योपैथी” के साथ अभियान अंतर्गत जानकारी देते हुए कहा कि वैक्सीन लगवा चुके लोग यह मानकर निश्चिंत हो कि वे पूर्णता सुरक्षित हैं, और बचे लोगों में अभी तक न लगवा पाने के बीच पुनः संक्रमण का भय होने, या संक्रमण को केवल सर्दी जुकाम की तरह कम खतरनाक मानकर निश्चिंतता का भाव और इस प्रकार कुल मिलाकर लापरवाही निश्चित रूप से भविष्य के खतरे का संकेत हो सकती है। डा त्रिपाठी ने तर्क दिया कि स्वयं को प्रभावी बनाये रखने के लिए विषाणु में स्वभावतः समय के साथ जेनेटिक मैटेरियल में परिवर्तन या म्यूटेशन के जरिये नए वैरिएंट बनाने का गुण पाया जाता है, इसलिए हो सकता है कि एक समय कम खतरनाक किन्तु अधिक संक्रामक वेरिएंट के प्रभाव से हम निश्चिंत हो जाएं किन्तु संभव है उसके बाद उसका कोई प्रभावी म्यूटेशन अधिक खतरनाक रूप में सामने आ जाये, इसलिए कम से कम छः माह तक हमे अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए और कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए।

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