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पतंग के साथ हवा में फिर तैरने लगा खतरनाक मांझा

दुकानदार चोरी छिपे कर रहे बिक्री
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। मकरसंक्रांति का पर्व नजदीक आते ही हवा में फिर खतरनाक मांझा तैरने लगा है। जो राहगीरो का गला भी रेत सकता है। इसके बावजूद इस पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं दिख रहा है। चाइनीज मांझा पर रोक लगाई गई है परन्तु दुकानदार उसे चोरी छिपे बेच रहे ह। वही कुछ दुकानदार तो चाइनीज की तरह ही प्लास्टिक में कांच, केमिकल व स्टील का बुरादा मिलाकर बनाया गया स्थानीय मांझा भी बेच रहे है। देश में बना यह मांझा भी चाइनीज से कम खतरनाक नहीं है। इस समय मकर संक्रांति पर्व को देखते हुए पतंगबाजी शुरू हो गई है। सूत से बना मांझा, चाइनीज या प्लास्टिक से बने मांझा के सामने टिक नहीं पाता है। इसलिए एक दूसरे की पतंग काटने के लिए पतंग बाज काटो, मारो, पकड़ो का शोर मचाते हुए चाइनीज या प्लास्टिक से बने मांझा का इस्तेमाल कर रहे है। इसे प्लास्टिक के धागे पर पके हुए चावल में पिसा हुआ कांच, औद्योगिक गोद व लोहे का बुरादा मिलाकर तैयार किया जाता है। चावल के साथ सूखने पर कांच व लोहे का बुरादा इतना सख्त हो जाता है कि वह दूसरी पतंग की डोर तो काट ही देता है। यदि कोई राहगीर इसकी चपेट मे आ गया तो उसको भी तलवार की धार की तरह रेत देता है। यही नहीं पतंग के साथ कटकर मांझा का टुकड़ा पेड़ की डालियो पर लिपटकर लटकता रहता है। इसमें फंसकर पक्षी व बंदर जब खुद को छुड़ाने के लिए छटपटाते है तो यह उनके शरीर में लिपटकर उन्हे बुरी तरह जख्मी कर देता है। इससे कभी कभी पक्षियो की जान भी चली जाती है। वही जिस मांझा पर लोहे का बुरादा लिपटा होता है वह पतंग से कटकर जब बिजली के तारो से झूलता है तो उसमें करंट आ जाता है। इसमें सम्पर्क में आकर कभी कभी लोग करंट का शिकार हो जाते है। जानकारो का मानना है कि रूई के धागे से बनी सद्दी पतंग उड़ाने में सबसे सुरक्षित मानी जाती है। इसे लपेटने व ढील देने में पतंग उड़ाने वाले के हाथ भी नहीं छिलते और पतंग कटने पर उड़ने वाले धागे के सम्पर्क में आने वाले को भी घातक चोट नहीं आती है। वही आज के दौर में खासकर बच्चे व किशोर ऐसी डोर चाहते है जो अपनी पतंग को तो बचाए ही तथा दूसरो की पतंग की डोर भी आसानी से काट दे।

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दुकानदार चोरी छिपे कर रहे बिक्री
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। मकरसंक्रांति का पर्व नजदीक आते ही हवा में फिर खतरनाक मांझा तैरने लगा है। जो राहगीरो का गला भी रेत सकता है। इसके बावजूद इस पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं दिख रहा है। चाइनीज मांझा पर रोक लगाई गई है परन्तु दुकानदार उसे चोरी छिपे बेच रहे ह। वही कुछ दुकानदार तो चाइनीज की तरह ही प्लास्टिक में कांच, केमिकल व स्टील का बुरादा मिलाकर बनाया गया स्थानीय मांझा भी बेच रहे है। देश में बना यह मांझा भी चाइनीज से कम खतरनाक नहीं है। इस समय मकर संक्रांति पर्व को देखते हुए पतंगबाजी शुरू हो गई है। सूत से बना मांझा, चाइनीज या प्लास्टिक से बने मांझा के सामने टिक नहीं पाता है। इसलिए एक दूसरे की पतंग काटने के लिए पतंग बाज काटो, मारो, पकड़ो का शोर मचाते हुए चाइनीज या प्लास्टिक से बने मांझा का इस्तेमाल कर रहे है। इसे प्लास्टिक के धागे पर पके हुए चावल में पिसा हुआ कांच, औद्योगिक गोद व लोहे का बुरादा मिलाकर तैयार किया जाता है। चावल के साथ सूखने पर कांच व लोहे का बुरादा इतना सख्त हो जाता है कि वह दूसरी पतंग की डोर तो काट ही देता है। यदि कोई राहगीर इसकी चपेट मे आ गया तो उसको भी तलवार की धार की तरह रेत देता है। यही नहीं पतंग के साथ कटकर मांझा का टुकड़ा पेड़ की डालियो पर लिपटकर लटकता रहता है। इसमें फंसकर पक्षी व बंदर जब खुद को छुड़ाने के लिए छटपटाते है तो यह उनके शरीर में लिपटकर उन्हे बुरी तरह जख्मी कर देता है। इससे कभी कभी पक्षियो की जान भी चली जाती है। वही जिस मांझा पर लोहे का बुरादा लिपटा होता है वह पतंग से कटकर जब बिजली के तारो से झूलता है तो उसमें करंट आ जाता है। इसमें सम्पर्क में आकर कभी कभी लोग करंट का शिकार हो जाते है। जानकारो का मानना है कि रूई के धागे से बनी सद्दी पतंग उड़ाने में सबसे सुरक्षित मानी जाती है। इसे लपेटने व ढील देने में पतंग उड़ाने वाले के हाथ भी नहीं छिलते और पतंग कटने पर उड़ने वाले धागे के सम्पर्क में आने वाले को भी घातक चोट नहीं आती है। वही आज के दौर में खासकर बच्चे व किशोर ऐसी डोर चाहते है जो अपनी पतंग को तो बचाए ही तथा दूसरो की पतंग की डोर भी आसानी से काट दे।

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