प्रतापगढ़ । सेनानी ग्राम देवली परसन पांडे का पुरवा में आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पंडित सूरज बली पांडे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं लोकतंत्र रक्षक सेनानी की पुण्यतिथि पर श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध का आयोजन हुआ जिसमें धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास नी पूजन अर्चन एवं चित्र पर माल्यार्पण करने के पश्चात कहा कि पितरों के लिए श्रद्धा पूर्वक किए गए कार्य को श्राद्ध कहते हैं। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा के उर्धव कक्षा में पितरलोक है। जहां पितर गण निवास करते हैं। पितर लोक को आंखों से नहीं देखा जा सकता है। जीवात्मा जब से स्थूल देह से पृथक होती है उस स्थित को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों से बना है।” स्थूल पंचमहाभूते” स्थूल कर्मेन्दियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है। इसलिए हमें श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के लिए पितृपक्ष में दान इत्यादि करना चाहिए। श्रद्धा शब्द से श्राद्ध शब्द की निष्पत्ति होती है।” पुन्नाम नरकात॒ जायते इति पुत्र:”पुत्र पुन्नामक नरक से त्राण अर्थात जो रक्षा करता है वही पुत्र है। श्रद्धा शब्द के संबंध में मनुस्मृति वायु पद्म पुराण श्राद्ध तत्व श्राद्ध कल्पतरु आदि में विस्तृत वर्णन है। महर्षि पाराशर कहते हैं देश काल पात्र में हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म दर्भ अर्थात कुशा यव तथा मंत्रों से युक्त होकर श्रद्धा पूर्वक किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार पितरों के उद्देश्य जो ब्राह्मणों को दान दिया जाता है यानी द्रव्य भोजन वस्त्र शैय्या इत्यादि वही श्राद्ध है। श्राद्ध पुनर्जन्म के सिद्धांतों पर आधारित है हम पहले भी कुछ थे और बाद में भी कुछ होंगे। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरा है उसका जन्म भी निश्चित है। अपने कर्मों के अनुसार मनुष्य 8400000 योनियों में भटकता है। श्राद्ध कर्म में नाम गोत्र संबंध स्थान वस्तु आदि का खास महत्व है। जो हम दान में देते हैं। यदि जीव पशु रुप में है तो उसे बात तृण के रूप में मिलता है, देव योनि में है तो अमृत के रूप में प्राप्त होता है, यक्ष गंधर्व में है वह पान अर्थात अनेक भागों में प्राप्त होता है। प्रेत योनि में है तो सुंदर वायु के रूप में और भोग प्रसाद के रूप में प्राप्त होता है। पद्मपुराण में आया है जैसे भूला हुआ बछड़ा अपनी मां को हजारों गायों के बीच में पहचान लेता है। उसी प्रकार मंत्रों एवं क्रिया द्वारा शोधित वस्तु समुचित प्राणी के पास तक पहुंच जाती है वह चाहे जहां पर हो। पिता की मृत्यु की तिथि पर पितृपक्ष में ब्राह्मणों को दान देना चाहिए और भोजन कराना चाहिए। यदि तिथि ना मालूम हो तो अंतिम दिवस अमावस्या के दिन पिंडदान और भोजन इत्यादि करा कर ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देनी चाहिए। इस अवसर पर गणेश नारायण मिश्र एडवोकेट सदस्य राष्ट्रीय कार्यसमिति भाजपा डॉ राकेश सिंह संतोष दुबे पूर्व सभासद चंद्रशेखर दत्त पांडे रामानुज दास सुरेश शुक्ला पत्रकार प्रशांत सिंह राम मनोहर पांडे इस्पेक्टर राय प्रकाश पांडे भगवत प्रसाद पांडे आचार्य कौशल शशिधर प्रकाश पांडे विष्णु प्रकाश पांडे विनय पांडे नरसिंह बहादुर सिंह भगवती प्रसाद रजक डॉ राम अनुज पांडे देवी प्रसाद पांडे कल्लू पांडे सहित भारी संख्या में लोगों ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आपको दयालुता करुणा की प्रति मूर्ति बताया।
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