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इस गांव में रक्षाबंधन की अनोखी परंपरा रक्षाबंधन पर मिलती है हसिया की विदाई

कौंधियारा, प्रयागराज। कौंधियारा थाना छेत्र में रक्षाबंधन त्योहार मनाने की एक अनोखी परंपरा है। जिस पर भाभियां अपने घर आए ननद को राखी बांधने के बाद वापस ससुराल जाते समय हसिया की विदाई देती हैं। यह हसिया ग्रामीण इलाके में फसल और  घास काटने के काम में आती है। इसके अलावा यह एक आत्मरक्षा का प्राचीन औजार भी है जिसे महिलाएं हमेशा अपने कमर में रखती हैं। जब महिलाएं खेतों में काम करने के लिये जाती हैं तो उनके हाथ में हसिया जरूर रहती है। ऐसी तमाम कहानियां हैं ,जिसमें आत्मरक्षा के लिए महिलाओं ने अपनी हसिया का इस्तेमाल किया है। रामसखी, दुलारी, शिवपत्ती, अनारकली पुरबहीया जैसी कई महिलाओं ने अपनी बचपन की यादों से बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब हमारे ऊपर किसी पुरुष ने गलत निगाह डाली तो हमने अपनी हसिया से बचाव किया। हम इसका इस्तेमाल जंगली जानवरों और जहरीले जंतुओ से भी अपनी रक्षा के लिए  करते हैं। हसिया ही एक ऐसा औजार है जिसे महिलाएं खेती के काम में आत्मरक्षा के लिए प्रयोग करती हैं। इस गांव में  हरघर के कोने में  हंसिया मिल जाएगी। ज्यादातर श्रमिक और किसान परिवारों में हसिया का आज भी चलन है। इस बार रक्षाबंधन पर गांव के लोहारों के यहां रक्षाबंधन के पहले से ही भीड़ लगी रही। जारी गांव के सुरेश  विश्वकर्म जो थोड़ा ऊंचा सुनते हैं और सड़क किनारे जामुन के पेड़ के नीचे लोहारी का काम करते हैं उनके यहां भीड़ लगी रही। महिलाएं अपने ननदों को देने के लिए हसिया बनवा रही थी। इस समय एक हंसीया बनवाई  40 से 50 रूपया है। अगर पक्के लोहे और रेती की हसिया बनवा आएंगे तो उसका दाम ₹70 है। आत्मरक्षा के लिए या अपने साथी की  सुरक्षा के लिए फसल काटने वाली हसिया अभी भी भारत के कई हिस्सों में पर्सनल हथियार के रूप में महिलाओं द्वारा उपयोग में आती है। जिसका कोई भी  लाइसेंस नहीं बनाया जाता। वह इस्तेमाल की जा रही है लेकिन इसकी चर्चा और सराहना कहीं नहीं है। जबकि रक्षाबंधन के दिन हम नकली उपहारों मिठाइयों और चाइना की बनी परदेस से आई राखियां बांधने में लगे हैं।  आइए हम इसको पल्लवित पुष्पित करें और भारत  में ऐसी परंपराओं को इस परंपरा को मरने न दें।

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कौंधियारा, प्रयागराज। कौंधियारा थाना छेत्र में रक्षाबंधन त्योहार मनाने की एक अनोखी परंपरा है। जिस पर भाभियां अपने घर आए ननद को राखी बांधने के बाद वापस ससुराल जाते समय हसिया की विदाई देती हैं। यह हसिया ग्रामीण इलाके में फसल और  घास काटने के काम में आती है। इसके अलावा यह एक आत्मरक्षा का प्राचीन औजार भी है जिसे महिलाएं हमेशा अपने कमर में रखती हैं। जब महिलाएं खेतों में काम करने के लिये जाती हैं तो उनके हाथ में हसिया जरूर रहती है। ऐसी तमाम कहानियां हैं ,जिसमें आत्मरक्षा के लिए महिलाओं ने अपनी हसिया का इस्तेमाल किया है। रामसखी, दुलारी, शिवपत्ती, अनारकली पुरबहीया जैसी कई महिलाओं ने अपनी बचपन की यादों से बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब हमारे ऊपर किसी पुरुष ने गलत निगाह डाली तो हमने अपनी हसिया से बचाव किया। हम इसका इस्तेमाल जंगली जानवरों और जहरीले जंतुओ से भी अपनी रक्षा के लिए  करते हैं। हसिया ही एक ऐसा औजार है जिसे महिलाएं खेती के काम में आत्मरक्षा के लिए प्रयोग करती हैं। इस गांव में  हरघर के कोने में  हंसिया मिल जाएगी। ज्यादातर श्रमिक और किसान परिवारों में हसिया का आज भी चलन है। इस बार रक्षाबंधन पर गांव के लोहारों के यहां रक्षाबंधन के पहले से ही भीड़ लगी रही। जारी गांव के सुरेश  विश्वकर्म जो थोड़ा ऊंचा सुनते हैं और सड़क किनारे जामुन के पेड़ के नीचे लोहारी का काम करते हैं उनके यहां भीड़ लगी रही। महिलाएं अपने ननदों को देने के लिए हसिया बनवा रही थी। इस समय एक हंसीया बनवाई  40 से 50 रूपया है। अगर पक्के लोहे और रेती की हसिया बनवा आएंगे तो उसका दाम ₹70 है। आत्मरक्षा के लिए या अपने साथी की  सुरक्षा के लिए फसल काटने वाली हसिया अभी भी भारत के कई हिस्सों में पर्सनल हथियार के रूप में महिलाओं द्वारा उपयोग में आती है। जिसका कोई भी  लाइसेंस नहीं बनाया जाता। वह इस्तेमाल की जा रही है लेकिन इसकी चर्चा और सराहना कहीं नहीं है। जबकि रक्षाबंधन के दिन हम नकली उपहारों मिठाइयों और चाइना की बनी परदेस से आई राखियां बांधने में लगे हैं।  आइए हम इसको पल्लवित पुष्पित करें और भारत  में ऐसी परंपराओं को इस परंपरा को मरने न दें।

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