दस दिवसीय कृत्रिम गर्भाधान प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित
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कुंडा प्रतापगढ़ । जनपद के विकास में डेरी व्यवसाय एक प्रभावी व्यवसाय है। जनपद में डेरी पशुओं की संख्या अधिक होने के बाबजूद दूध उत्पादकता उस स्तर की नही है। इसके कई कारण है जैसे कि अच्छी नस्ल के पशुओ की कमी, संतुलित आहार का न होना, बेहतर प्रजनन तथा अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओ का अभाव इत्यादि। इन कमियो के साथ-साथ पशुओ में कृत्रिम गर्भाधान को लोगो द्वारा कम अपनाना और कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा का लोगो तक कम पहुंचना भी एक प्रमुख कारण है। कृत्रिम गर्भाधान नस्ल सुधार के लिये एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसको अपनाकर नस्ल सुधार से दूध उत्पादन में बढोतरी होगी। कृत्रिम गर्भाधान तकनीकी रूप से कुशल व्यक्तियों द्वारा ही किया जाना चाहिए अन्यथा गर्भधारण की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ (पशु चिकित्सा) डा0 अमित बरनवाल द्वारा नवयुवकों हेतु कृत्रिम गर्भाधान का 10 दिवसीय स्ववित्त पोषित प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया गया। प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षार्थियों को मादा पशुओं के प्रजनन अंगां की जानकारी, गर्मी के लक्षण, गर्भाधान का उचित समय, हिमीकृत वीर्य, द्रवित नाइट्रोजन सिलेन्डर, कृत्रिम गर्भाधान के यंत्रों का रखरखाव आदि के बारे में विधिवत जानकारी प्रायोगात्मक तरीके से दी गयी। इसके अलावा केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में भी बताया गया। केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं हेड डा0 एके श्रीवास्तव ने बताया कि कृत्रिम गर्भाधान एक वैज्ञानिक तकनीक है। केनस्ल सुधार के लिए इससे बेहतर कोई दूसरी तकनीकि नहीं है। प्रशिक्षणोपरान्त ज्ञान आकलन हेतु परीक्षा भी करायी गयी तथा सफल प्रशिक्षार्थियों को प्रमाण पत्र दिया गया। सफल प्रशिक्षार्थी किसानों के सम्पर्क में रहकर कृत्रिम गर्भाधान कर सकेगें तथा पशु नस्ल सुधार में अहम भूमिका निभा सकेगे। श्री महेन्द्र कुमार, अखिलेश कुमार, अभिशेख तिवारी, सुशील पटेल, शिवम कुमार, राहुल कुमार यादव, आयुष पाण्डेय, पारसनाथ पटेल आदि प्रमाणपत्र प्राप्त कर काफी प्रफुल्लित है।



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