मकर संक्रांति के दिन ही गंगोत्री से धरती पर पहुंची मां गंगा।
सन्तोष तिवारी
लीलापुर प्रतापगढ़ । सूर्य के मकर में आते ही समाप्त हो जाता है खरमास, मांगलिक कार्यों की हो जाती हैं शुरुआत। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर गंगा स्नान का होता है विशेष महत्व। मकर राशि के स्वामी हैं शनिदेव। मकर संक्रांति के ही दिन गंगोत्री से मां गंगा धरती पर पहुंची।
सनातन धर्म में मकर संक्रांति के पर्व का विशेष महत्व है। इस बार मकर संक्रांति पर विशेष संयोग बन रहे हैं, जिससे इस पर्व की महत्ता और बढ़ जाती है। सूर्य जब अपने पुत्र की राशि मकर में प्रवेश करते हैं, उस दिन संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है। इस बार सूर्य 14 जनवरी शनिवार को रात्रि 2 बजकर 53 मिनट पर प्रवेश करने वाले हैं। सूर्य के मकर में आते ही खरमास भी समाप्त हो जाएगा और फिर से मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे। इसलिए इस वर्ष 15जनवरी को मकर संक्रान्ति का पर्व मनाया जायेगा ।सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर पवित्र नदी गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व है। ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और अक्षय पुण्य का फल प्राप्त होता है। साथ ही गंगा स्नान करने से जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और देवी-देवता एकसाथ प्रसन्न हो जाते हैं।इसी दिन से भगवान भास्कर उत्तरायण में प्रवेश करेंगे । ऐसी मान्यता है कि उत्तरायण में किसी की मृत्यु होती है तो उसका उद्धार हो जाता है। पितामह भीष्म ने 58 दिन तक शरशैय्या पर रहकर उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी । पिता पुत्र के सम्बन्ध के लिए भी यह पर्व याद किया जाता है । सूर्य आज ही अपने पुत्र शनि के घर आते है। मकर राशि का स्वामी शनि है । आज के दिन तीर्थ सरोवर में स्नान कर दान करने का अत्यन्त महत्व है । गंगा स्नान को लेकर कथा आती है कि मकर संक्रांति के दिन ही मां गंगा धरती पर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुईं गंगा सागर में पहुंची थीं, इसके पीछे एक कथा है। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में सूर्यवंशी चक्रवती सम्राट सगर थे। उनकी दो रानियां थी। उनकी एक रानी केशनी से एक पुत्र असमंजस था तो दूसरी से 60 हजार पुत्र थे। एक दिन राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। जिसके लिए उन्होंने अपने घोड़े को छोड़ दिया, जिसको राज इंद्र ने चुराकर पाताल लोक में कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा ने अपने 60 हजार पुत्रों को घोड़े की खोजकर लाने का आदेश दिया। जब उन्होंने कपिल मुनि के आश्रम में घोड़े को बंधा देखा तो उन्होंने आश्रम पर हमला कर दिया। इससे क्रोधित होकर कपिल मुनि ने आंखों की ज्वाला से 60 हजार पुत्रों को जलाकर राख कर दिया। राजा सगर को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने कपिल मुनि से उनके लिए उद्धार के लिए प्रार्थना की। तब मुनि ने बताया कि गंगा जल से ही इनको मुक्ति मिलेगी। राजा ने अपने पौत्र अंशुमन को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया और तप करने चले गए।इसके बाद अंशुमन के पौत्र राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कठोर तपस्या की। जिससे प्रसन्न होकर माता गंगा ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। लेकिन गंगा धरती पर कैसे आएं और इनकी धारा इतनी तेज थी कि धरती पर तबाही ला सकती है। इसके लिए भागीरथ ने एकबार फिर भगवान शिव की तपस्या की और मदद की गुहार लगाई। भगवान शिव प्रसन्न होकर भागीरथ की मदद की। उन्होंने अपनी जटाओं में गंगाजी को धारण किया और वहां से धरती पर जाने के लिए कहा। शिवजी की जटाओं से निकली गंगा धरती पर मकर संक्रांति के दिन पहुंची थीं। गंगाजी धरती पर गंगोत्री से आईं और भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम पहुंची, जहां राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मुक्ति मिली। यहीं से वह गंगा सागर में मिल गईं।
मकर संक्रांति के दिन ही गंगोत्री से धरती पर पहुंची मां गंगा।
सन्तोष तिवारी
लीलापुर प्रतापगढ़ । सूर्य के मकर में आते ही समाप्त हो जाता है खरमास, मांगलिक कार्यों की हो जाती हैं शुरुआत। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर गंगा स्नान का होता है विशेष महत्व। मकर राशि के स्वामी हैं शनिदेव। मकर संक्रांति के ही दिन गंगोत्री से मां गंगा धरती पर पहुंची।
सनातन धर्म में मकर संक्रांति के पर्व का विशेष महत्व है। इस बार मकर संक्रांति पर विशेष संयोग बन रहे हैं, जिससे इस पर्व की महत्ता और बढ़ जाती है। सूर्य जब अपने पुत्र की राशि मकर में प्रवेश करते हैं, उस दिन संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है। इस बार सूर्य 14 जनवरी शनिवार को रात्रि 2 बजकर 53 मिनट पर प्रवेश करने वाले हैं। सूर्य के मकर में आते ही खरमास भी समाप्त हो जाएगा और फिर से मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे। इसलिए इस वर्ष 15जनवरी को मकर संक्रान्ति का पर्व मनाया जायेगा ।सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर पवित्र नदी गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व है। ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और अक्षय पुण्य का फल प्राप्त होता है। साथ ही गंगा स्नान करने से जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और देवी-देवता एकसाथ प्रसन्न हो जाते हैं।इसी दिन से भगवान भास्कर उत्तरायण में प्रवेश करेंगे । ऐसी मान्यता है कि उत्तरायण में किसी की मृत्यु होती है तो उसका उद्धार हो जाता है। पितामह भीष्म ने 58 दिन तक शरशैय्या पर रहकर उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी । पिता पुत्र के सम्बन्ध के लिए भी यह पर्व याद किया जाता है । सूर्य आज ही अपने पुत्र शनि के घर आते है। मकर राशि का स्वामी शनि है । आज के दिन तीर्थ सरोवर में स्नान कर दान करने का अत्यन्त महत्व है । गंगा स्नान को लेकर कथा आती है कि मकर संक्रांति के दिन ही मां गंगा धरती पर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुईं गंगा सागर में पहुंची थीं, इसके पीछे एक कथा है। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में सूर्यवंशी चक्रवती सम्राट सगर थे। उनकी दो रानियां थी। उनकी एक रानी केशनी से एक पुत्र असमंजस था तो दूसरी से 60 हजार पुत्र थे। एक दिन राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। जिसके लिए उन्होंने अपने घोड़े को छोड़ दिया, जिसको राज इंद्र ने चुराकर पाताल लोक में कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा ने अपने 60 हजार पुत्रों को घोड़े की खोजकर लाने का आदेश दिया। जब उन्होंने कपिल मुनि के आश्रम में घोड़े को बंधा देखा तो उन्होंने आश्रम पर हमला कर दिया। इससे क्रोधित होकर कपिल मुनि ने आंखों की ज्वाला से 60 हजार पुत्रों को जलाकर राख कर दिया। राजा सगर को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने कपिल मुनि से उनके लिए उद्धार के लिए प्रार्थना की। तब मुनि ने बताया कि गंगा जल से ही इनको मुक्ति मिलेगी। राजा ने अपने पौत्र अंशुमन को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया और तप करने चले गए।इसके बाद अंशुमन के पौत्र राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कठोर तपस्या की। जिससे प्रसन्न होकर माता गंगा ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। लेकिन गंगा धरती पर कैसे आएं और इनकी धारा इतनी तेज थी कि धरती पर तबाही ला सकती है। इसके लिए भागीरथ ने एकबार फिर भगवान शिव की तपस्या की और मदद की गुहार लगाई। भगवान शिव प्रसन्न होकर भागीरथ की मदद की। उन्होंने अपनी जटाओं में गंगाजी को धारण किया और वहां से धरती पर जाने के लिए कहा। शिवजी की जटाओं से निकली गंगा धरती पर मकर संक्रांति के दिन पहुंची थीं। गंगाजी धरती पर गंगोत्री से आईं और भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम पहुंची, जहां राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मुक्ति मिली। यहीं से वह गंगा सागर में मिल गईं।



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