ज्ञानप्रकाश शुक्ल।
प्रतापगढ़। तीर्थराज प्रयाग एवं मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या धाम के मध्य छोर पर आदिगंगा सई के तटवर्ती प्रतापगढ़ को आध्यात्मिक चेतना के शंखनाद का काल खण्डों में सदैव अलंकरण शोभायमान हुआ दिखा है। बाबा घुइसरनाथ धाम के हजारों वर्षाे से स्थापित मान्य परम्पराओं की पौराणिक स्थली तथा इसी वसुन्धरा पर मां बेल्हा देवी की आदिशक्ति के रूप में चिर काल से पूजा अर्चना प्रतापगढ़ को संत महात्माओं का अवतरण समय समय पर देते रहने का अपनी थाती की विशिष्टता भी रखती है। बाबा भयहरण नाथ धाम, पतित पावनी गंगा के तट पर बाबा हौदेश्वर नाथ धाम, श्री शनिदेव महराज, बाबा बेलखरनाथ धाम, मां बाराही देवी, मां इनहन भवानी धाम, मां चण्डिकन देवी धाम जैसी पवित्र आस्था की स्थली पर प्रतापगढ़ तब के बेल्हा को विश्व के सनातनी संस्कृति पटल पर धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी की भी पावन जन्मस्थली का गौरव गौरवान्वित किये हुए है। प्रतापगढ़ के लालगंज तहसील का भटनी गांव धर्मसम्राट करपात्री जी महराज को अपनी पावन कोख में जन्म देने का अलंकरण रखता आ रहा है। कुण्डा के मनगढ़ में जगद्गुरू कृपालु जी महराज की तपसाधना भी प्रतापगढ़ की आध्यात्मिक चेतना को विश्व पटल पर प्रवहमान बनाये हुए है। इसी प्रतापगढ़ को अब हर्ष और उत्कर्ष मे तब देखा जा रहा है जब कलिकाल की सनातनी साधना में तपे रमे एक तपस्वी दण्डी स्वामी श्रीयुत् श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महराज को पवित्र ज्योतिष पीठ के श्री शंकराचार्य के वंदनीय अलंकरण ने आध्यात्मिक एवं सनातनी संस्कृति का स्वर्णिम इतिहास रचा है। प्रतापगढ़ की पट्टी तहसील के ब्राम्हणपुर गांव में पाण्डव परिवार में जन्मे सुगोत्री शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने आधुनिक काल में देश की सनातन संस्कृति का एक वह अध्याय रचा है जिसे देख सुन प्रतापगढ़ का कोना कोना धर्म की जय के शंखनाद मे गंूज उठा है। संस्कृत वांग्यमय के मूर्धन्य विद्वान एवं पवित्र काशी में बटुकों की दीक्षा शिक्षा के महान शिल्पी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने दण्ड एवं सन्यास का तप फलीभूत कर स्वतंत्रता आन्दोलन की पवित्र धरती प्रतापगढ़ को रोमांचित किया है। इनहन भवानी धाम के आचार्य कुल के ध्वजवाहक जगदगुरू स्वामी करपात्री जी काशी आश्रम के दण्डी स्वामी रहे पूज्य देवलोकवासी स्वामी वैभवानंद सरस्वती (पं. शंकरदत्त मिश्र) के सुयोग्य सुपुत्र आचार्य पं. राजेश मिश्र का कहना है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महराज ने प्रतापगढ़ की संस्कृति व संस्कृत को नई सदी में जो गौरव प्रदान किया है वह आत्मानुभूति को गद गद मान बनाए है। आचार्य राजेश मिश्र स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महराज के अनुयायियों में से एक होने के नाते इस गौरव को विलक्षण क्षण बताते हैं। श्री शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महराज के देव लोकगमन के पश्चात् जगद्गुरू स्वामी करपात्री जी महराज एवं स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महराज की विचारधारा को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महराज की राष्ट्रीय चिंतन की पहले ही वक्तव्य में बड़ी लकीर खींच गयी है– साधु सन्तों का शोक नहीं मनाया जाता, ब्रिटेन की महरानी एलिजा बेथ के निधन पर ध्वज झुकाया जाना तब जब ब्रिटिश सत्ता को सवा लाख हिन्दुस्तानियों को मार डालने का अभिशाप हो देश का इस मौके पर ध्वज झुकाया जाना देश के लोगों का आक्रोश जरूर है। इस वक्तव्य से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महराज ने बेल्हा की धरती के स्वाभिमानी राष्ट्र भक्त से ओत-प्रोत विचारधारा को अखण्ड लकीर भी सौंपी है। प्रतापगढ़ इस सनातनी गौरव का एक बार फिर गर्व से कोने-कोने से बोल उठा है- धर्म तुम्हारी जय हो ।



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