कवियों के संग फागुन के रंग ने बांधी समां
करछना(प्रयागराज)। क्षेत्र के करछना गांव स्थित लोक कलाकार मोहिनी श्रीवास्तव के आवास पर आयोजित कार्यक्रम,कवियों के फागुन के रंग, में मौजूद कवियों ने हास्य व्यंग ओर फागुनी गीतों के शब्दरंग बरसाये।आयोजक वेद श्रीवास्तव द्वारा सरस्वती पूजाऔर अबीर गुलाल लगाकर कवियों के स्वागत के बाद संचालन कर रहे चर्चित हास्य कवि अशोक बेसरम ने गांव गलियारे में होली के दृश्य को कुछ इस प्रकार बयां किया-धूम मची डगरी डगरी,सगरी नगरी बगरी अहै होली।रंग गुलाल उड़ै सगरौ,कतहूं गुझिया कहूं भांग कै गोली। जीतेन्द्र जलज ने राजनीति के गलियारे में दस्तक देते हुए विसंगतियों पर तंज कसे-बडे़ बहादुर बने थेअब तक,अब बन गये बे चारू,बन्द हो गई खांसी जबसे,सिर पे चढ़ गई दारू। सन्तोष शुक्ल समर्थ के जोगीरा मुक्तकों ने खूब समां बांधी- दोनों ही अनमोल है,इक खद्दर एक सिल्क। जीजा छाप अमूल ज्यों,साली डेरी मिल्क,जोगीरा सारारारा …। वरिष्ठ गीतकार राजेन्द्र शुक्ल के छन्द मुक्तकों ने होली के अर्थभाव से सद्भाव,प्रेम,समरसता और लोक संस्कृति को संजोए रखने हेतु प्रेरित किया। अपने संदेश परक मुक्तक में कहा- होली में जला दें हम नफरत के घरौंदे, फिर प्रेम के रंगों की बरसाते करा दें। एकता की रोली मस्तक पर लगाकर,मिलकर गले दिलों में उतर जांयं तो होली। लोकगायिका मोहिनी श्रीवास्तव के होली गीत-फगुनवा में रंग रसेरसे बरसे,भी खूब सराहा गया। कार्यक्रम के उपरान्त सभी कवियों ने एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर रंग पर्व की अग्रिम बधाई दी।
कवियों के संग फागुन के रंग ने बांधी समां
करछना(प्रयागराज)। क्षेत्र के करछना गांव स्थित लोक कलाकार मोहिनी श्रीवास्तव के आवास पर आयोजित कार्यक्रम,कवियों के फागुन के रंग, में मौजूद कवियों ने हास्य व्यंग ओर फागुनी गीतों के शब्दरंग बरसाये।आयोजक वेद श्रीवास्तव द्वारा सरस्वती पूजाऔर अबीर गुलाल लगाकर कवियों के स्वागत के बाद संचालन कर रहे चर्चित हास्य कवि अशोक बेसरम ने गांव गलियारे में होली के दृश्य को कुछ इस प्रकार बयां किया-धूम मची डगरी डगरी,सगरी नगरी बगरी अहै होली।रंग गुलाल उड़ै सगरौ,कतहूं गुझिया कहूं भांग कै गोली। जीतेन्द्र जलज ने राजनीति के गलियारे में दस्तक देते हुए विसंगतियों पर तंज कसे-बडे़ बहादुर बने थेअब तक,अब बन गये बे चारू,बन्द हो गई खांसी जबसे,सिर पे चढ़ गई दारू। सन्तोष शुक्ल समर्थ के जोगीरा मुक्तकों ने खूब समां बांधी- दोनों ही अनमोल है,इक खद्दर एक सिल्क। जीजा छाप अमूल ज्यों,साली डेरी मिल्क,जोगीरा सारारारा …। वरिष्ठ गीतकार राजेन्द्र शुक्ल के छन्द मुक्तकों ने होली के अर्थभाव से सद्भाव,प्रेम,समरसता और लोक संस्कृति को संजोए रखने हेतु प्रेरित किया। अपने संदेश परक मुक्तक में कहा- होली में जला दें हम नफरत के घरौंदे, फिर प्रेम के रंगों की बरसाते करा दें। एकता की रोली मस्तक पर लगाकर,मिलकर गले दिलों में उतर जांयं तो होली। लोकगायिका मोहिनी श्रीवास्तव के होली गीत-फगुनवा में रंग रसेरसे बरसे,भी खूब सराहा गया। कार्यक्रम के उपरान्त सभी कवियों ने एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर रंग पर्व की अग्रिम बधाई दी।



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