प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। सूर्योपासना के चार दिवसीय पर्व के आवसर पर मंगलवार को महिलाओ ने खरवा का व्रत रखा। साथ ही शाम को रोटी व गन्ने का रस अथवा गुड़ की बट्टी खायी। इसके पूर्व पहिले दिन महिलाओ ने शाम को चने की दाल और लौकी की सब्जी तथा हाथ से पीसे चक्की से पीसे आटे की पूड़ी खाया। डाला छठ पर्व को लेकर शहर से ग्रामीण क्षेत्रो तक महिलाओ में विशेष उत्साह देखा गा। इसकी तैयारियां व्यापक स्तर पर की जा रही है। इस पर्व को लेकर बाजारो व चैराहो पर इसमें प्रयुक्त होने वाले सामानो की दुकानो पर भीड़ उमड़ रही। श्रद्धालु विभिन्न प्रकार के फल, गन्ना आदि खरीद रहे है। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थो के सूर्योपासना के सम्बंध में विस्तृत तथा विपुल सामग्री उपलब्ध है। पृथ्वी मंडल पर जीवन, दिवारात्रि, कृषि, मौसम, वन आदि से सम्बंधित सकल गतिविधियां तथा क्रिया कलापो के मूल में सूर्य देव है। यदि संसार में सूर्यदेव का अस्तित्व न होता तो सृष्टि और जीवन का संचालन मुश्किल हो जाता। इस स्थिति में सूर्योपासना के पीछे मूल भावना सूर्यदेव के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता प्रकट करना होता है। अपने देश में सूर्योपासना की परम्परा अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध है। इस पर्व पर नदियो, तालाबो, पोखरो में खड़े होकर सूर्य को अध्र्य देने की परम्परा है। इस पर्व पर कुछ व्रती महिलाएं पण्डितो से अध्र्य दिलवाती है। अनेक व्रती महिलाओ क परिवार या उनके पति भी सूर्य को अध्र्य देते है। इस प्रकार सूर्योपासना का पर्व परम्परागत श्रद्धा एवं भक्ति भावना के साथ प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। इस पर्व के बारे में बताया जाता है कि महिलाएं सांयकाल अस्तांचल गामी सूर्य को अध्र्य देकर छठी मां के गीत गाती है। साथ ही छठमाता की मूर्ति और मिट्टी की वेदी बनाकर रात में पूजन करती है। महिलाएं तड़के ही नदियो, सरोवरो और तालाबो के किनारे पहुंचकर अपने पुत्र और पति के दीर्घायु की कामना करती है।
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। सूर्योपासना के चार दिवसीय पर्व के आवसर पर मंगलवार को महिलाओ ने खरवा का व्रत रखा। साथ ही शाम को रोटी व गन्ने का रस अथवा गुड़ की बट्टी खायी। इसके पूर्व पहिले दिन महिलाओ ने शाम को चने की दाल और लौकी की सब्जी तथा हाथ से पीसे चक्की से पीसे आटे की पूड़ी खाया। डाला छठ पर्व को लेकर शहर से ग्रामीण क्षेत्रो तक महिलाओ में विशेष उत्साह देखा गा। इसकी तैयारियां व्यापक स्तर पर की जा रही है। इस पर्व को लेकर बाजारो व चैराहो पर इसमें प्रयुक्त होने वाले सामानो की दुकानो पर भीड़ उमड़ रही। श्रद्धालु विभिन्न प्रकार के फल, गन्ना आदि खरीद रहे है। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थो के सूर्योपासना के सम्बंध में विस्तृत तथा विपुल सामग्री उपलब्ध है। पृथ्वी मंडल पर जीवन, दिवारात्रि, कृषि, मौसम, वन आदि से सम्बंधित सकल गतिविधियां तथा क्रिया कलापो के मूल में सूर्य देव है। यदि संसार में सूर्यदेव का अस्तित्व न होता तो सृष्टि और जीवन का संचालन मुश्किल हो जाता। इस स्थिति में सूर्योपासना के पीछे मूल भावना सूर्यदेव के प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता प्रकट करना होता है। अपने देश में सूर्योपासना की परम्परा अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध है। इस पर्व पर नदियो, तालाबो, पोखरो में खड़े होकर सूर्य को अध्र्य देने की परम्परा है। इस पर्व पर कुछ व्रती महिलाएं पण्डितो से अध्र्य दिलवाती है। अनेक व्रती महिलाओ क परिवार या उनके पति भी सूर्य को अध्र्य देते है। इस प्रकार सूर्योपासना का पर्व परम्परागत श्रद्धा एवं भक्ति भावना के साथ प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। इस पर्व के बारे में बताया जाता है कि महिलाएं सांयकाल अस्तांचल गामी सूर्य को अध्र्य देकर छठी मां के गीत गाती है। साथ ही छठमाता की मूर्ति और मिट्टी की वेदी बनाकर रात में पूजन करती है। महिलाएं तड़के ही नदियो, सरोवरो और तालाबो के किनारे पहुंचकर अपने पुत्र और पति के दीर्घायु की कामना करती है।



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