प्रतापगढ़। श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे चरण में आज पूर्वी सहोदर पुर स्थित बृज विमला वाणी के प्रधान कार्यालय पर यजमान विंध्यवासिनी श्रीवास्तव को कथा सुनाते हुए कथा व्यास पंडित करुणा शंकर द्विवेदी जी ने मार्मिक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए उपस्थित भक्त जनों को उद्बबोधित किया कि श्रीमद् भागवत कथा का महात्म मानव जीवन के मूल्यों पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। तन मन से अंगीकार की जाने वाली कथा ही भागवत कथा की सार्थकता को सिद्ध करती है। मालूम हो कि मुख्य यजमान विंध्यवासिनी के आवास पर आयोजित कथा का सविस्तार वर्णन करते हुए कथा व्यास श्री द्विवेदी जी ने राजा परीक्षित के जन्म पर कथा का व्याख्यान मार्मिक और सरल भाषा में व्यक्त करते हुए कहा कि राजा परीक्षित धर्मनिष्ठ और कर्तव्य परायण राजा थे। जिन्होंने अपने शासनकाल में सदाचार पुण्य और सत्कार को ही अपने जीवन का मूल अंग के रुप में स्वीकार किया था। कालचक्र बदलता है और वर्तमान और पूर्व जन्मों के पुण्य, सत्कर्म और पाप कर्मों के आधार पर ही वर्तमान जीवन स्वरूप निर्धारित होता है। यही जीव के 84 लाख योनियों के भ्रमण का निर्धारण करती है। महाभारत के अवसान काल के पश्चात राजा परीक्षित का प्रादुर्भाव हुआ और उसी समय से कलयुग के आगमन की आहट भी सृषिट पर पड़ी। श्री द्विवेदी जी ने कहा कि कथा भागवत सुनकर श्रोता जितना उसको अंगीकार करते हैं, वही कथा की सार्थकता को साबित करता है, और मुक्ति के साधन का मुख्य मार्ग बनता है । मुक्ति के साधन में आधुनिक काल में कथा की प्रासंगिकता और उसकी स्वीकारोक्ति ही भागवत कथा का सार है। कार्यक्रम के अंत में भगवान की आरती और भजन संकीर्तन के पश्चात कार्यक्रम का विसर्जन हुआ। तत्पश्चात प्रसाद वितरण का कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस अवसर पर सपा नेता अश्वनी सोनी, डॉक्टर संजय सिंह, राजीव सिंह व मुख्य यजमान विंध्यवासिनी श्रीवास्तव, अर्चना, पूर्णिमा श्रीवास्तव, हिमांशु प्रकाश श्रीवास्तव, गौरव श्रीवास्तव, सूर्य प्रकाश श्रीवास्तव, आदि लोग उपस्थित होकर श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण किए और कथा के दूसरे दिन का प्रसाद ग्रहण करें प्रस्थान किए।
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कथा का श्रवण, मनन, और स्वीकारोक्ति ही श्रीमद् भागवत कथा का मूल मंत्र -पंडित करुणा शंकर द्विवेदी
प्रतापगढ़। श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे चरण में आज पूर्वी सहोदर पुर स्थित बृज विमला वाणी के प्रधान कार्यालय पर यजमान विंध्यवासिनी श्रीवास्तव को कथा सुनाते हुए कथा व्यास पंडित करुणा शंकर द्विवेदी जी ने मार्मिक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए उपस्थित भक्त जनों को उद्बबोधित किया कि श्रीमद् भागवत कथा का महात्म मानव जीवन के मूल्यों पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। तन मन से अंगीकार की जाने वाली कथा ही भागवत कथा की सार्थकता को सिद्ध करती है। मालूम हो कि मुख्य यजमान विंध्यवासिनी के आवास पर आयोजित कथा का सविस्तार वर्णन करते हुए कथा व्यास श्री द्विवेदी जी ने राजा परीक्षित के जन्म पर कथा का व्याख्यान मार्मिक और सरल भाषा में व्यक्त करते हुए कहा कि राजा परीक्षित धर्मनिष्ठ और कर्तव्य परायण राजा थे। जिन्होंने अपने शासनकाल में सदाचार पुण्य और सत्कार को ही अपने जीवन का मूल अंग के रुप में स्वीकार किया था। कालचक्र बदलता है और वर्तमान और पूर्व जन्मों के पुण्य, सत्कर्म और पाप कर्मों के आधार पर ही वर्तमान जीवन स्वरूप निर्धारित होता है। यही जीव के 84 लाख योनियों के भ्रमण का निर्धारण करती है। महाभारत के अवसान काल के पश्चात राजा परीक्षित का प्रादुर्भाव हुआ और उसी समय से कलयुग के आगमन की आहट भी सृषिट पर पड़ी। श्री द्विवेदी जी ने कहा कि कथा भागवत सुनकर श्रोता जितना उसको अंगीकार करते हैं, वही कथा की सार्थकता को साबित करता है, और मुक्ति के साधन का मुख्य मार्ग बनता है । मुक्ति के साधन में आधुनिक काल में कथा की प्रासंगिकता और उसकी स्वीकारोक्ति ही भागवत कथा का सार है। कार्यक्रम के अंत में भगवान की आरती और भजन संकीर्तन के पश्चात कार्यक्रम का विसर्जन हुआ। तत्पश्चात प्रसाद वितरण का कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस अवसर पर सपा नेता अश्वनी सोनी, डॉक्टर संजय सिंह, राजीव सिंह व मुख्य यजमान विंध्यवासिनी श्रीवास्तव, अर्चना, पूर्णिमा श्रीवास्तव, हिमांशु प्रकाश श्रीवास्तव, गौरव श्रीवास्तव, सूर्य प्रकाश श्रीवास्तव, आदि लोग उपस्थित होकर श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण किए और कथा के दूसरे दिन का प्रसाद ग्रहण करें प्रस्थान किए।



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