मां स्कन्द माता व मां कात्यायनी की हुई पूजा अर्चना देवी मंदिरो एवं पूजा पाण्डालो में उमड़े श्रद्धालु
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। शारदीय नवरात्र पर हर समय देवीमय बना हुआ है। मां भवानी के विभिन्न स्वरूपो की पूजा अर्चना की जा रही है। सोमवार को मां के स्कंद माता एवं कात्यायनी स्वरूप की पूजा अर्चना विधि विधान के साथ की गई। आज देवी मंदिरो एवं पूजा पाण्डालो में श्रद्धालु की भारी भीड़ रही। सुबह से ही पूजन अर्चन का शुरू हुआ क्रम देर रात तक चलता रहा। भक्तो के जयकारे से वातावरण देवीमय बना रहा। शारदीय नवरात्र का आज पांचवा दिन है। आज दो तिथियां होने के कारण मां भवानी के स्कंदमाता एवं कात्यायनी की पूजा एक ही दिन की गई। पौराणिक मान्यता के अनुसार मां भगवती का पांचवा स्वरूप कार्तिकेय एवं गणेश जी की माता का है। तारकासुर का वध करने के लिए मां पार्वती एवं भगवान शिव ने विवाह किया था। उनसे कार्तिकेय उत्पन्न हुए और तारकासुर का अन्त किया। तारकासुर को यह वरदान था कि उसे भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता है अन्यथा उसका अंत नहीं होगा। स्कंद माता मां पार्वती का ही स्वरूप है। वही मां भगवती के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के बारे में कहा जाता है कि कंत नामक एक महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्ही कात्य के गोत्र में महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए कई वर्षो तक कठिन तपस्या की थी। इनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म ले। मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की। दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रम्हा, विष्णु, महेश तीनो ने अपने अपने तेज के अंश द्वारा महिषासुर के विनाश के लिए देवी महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाई। मां कात्यायनी ने दशमी को महिषासुर का वध किया था। इनका स्वरूप अत्यंत चमकीला भास्कर है। इनकी चार भुजाएं है। माता जी का दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बायी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। आज नगर की अधिष्ठात्री मां बेल्हा देवी में तड़के से ही पूजन अर्चन के लिए कतार लग गई। इसके बाद देर रात तक पूजन अर्चन का क्रम चलता रहा। मां का जयकारा करते लोग पूजन करने के लिए उतावले दिख रहे थे। बलीपुर स्थित दुर्गा मंदिर पर भी काफी लोगो की भीड़ सुबह से जुटने लगी। यही हाल मां चन्द्रिका धाम, मां ज्वाला देवी एवं मां बाराही देवी धाम का भी था। इसके अलावा दहिलामऊ की चन्द्रिका मंदिर सेनानी नगर की मां सर्वेश्वरी मंदिर आदि में लोगो ने विधि विधान के साथ मां की पूजा आराधना की। उधर पूजा पाण्डालो में भी आज काफी भीड़ रही। सुबह शाम दोनो समय पूजन एवं आरती की धूम रही। उधर पूजा पाण्डालो में मां की मनोहारी प्रतिमाएं स्थापित की गई है। लोग शाम होते ही पूजा पाण्डालो की सजावट देखने निकल पड़ते है। साथ ही पूजन व आरती में शामिल होकर तथा प्रसाद ग्रहण करके ही घर जाते है। इतना ही नहीं यह मां भवानी के पूजन का दिन है, इसका एहसास पूजा पाण्डालो में बजने वाले देवी गीत भी करा रहे है। तमाम पूजा पाण्डालो में महिलाएं भी भजन गाकर वातावरण को देवीमय बना रही ह। कुल मिलाकर दिन हो या रात सब कुछ देवीमय दिख रहा है।
मां स्कन्द माता व मां कात्यायनी की हुई पूजा अर्चना देवी मंदिरो एवं पूजा पाण्डालो में उमड़े श्रद्धालु
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। शारदीय नवरात्र पर हर समय देवीमय बना हुआ है। मां भवानी के विभिन्न स्वरूपो की पूजा अर्चना की जा रही है। सोमवार को मां के स्कंद माता एवं कात्यायनी स्वरूप की पूजा अर्चना विधि विधान के साथ की गई। आज देवी मंदिरो एवं पूजा पाण्डालो में श्रद्धालु की भारी भीड़ रही। सुबह से ही पूजन अर्चन का शुरू हुआ क्रम देर रात तक चलता रहा। भक्तो के जयकारे से वातावरण देवीमय बना रहा। शारदीय नवरात्र का आज पांचवा दिन है। आज दो तिथियां होने के कारण मां भवानी के स्कंदमाता एवं कात्यायनी की पूजा एक ही दिन की गई। पौराणिक मान्यता के अनुसार मां भगवती का पांचवा स्वरूप कार्तिकेय एवं गणेश जी की माता का है। तारकासुर का वध करने के लिए मां पार्वती एवं भगवान शिव ने विवाह किया था। उनसे कार्तिकेय उत्पन्न हुए और तारकासुर का अन्त किया। तारकासुर को यह वरदान था कि उसे भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता है अन्यथा उसका अंत नहीं होगा। स्कंद माता मां पार्वती का ही स्वरूप है। वही मां भगवती के छठे स्वरूप मां कात्यायनी के बारे में कहा जाता है कि कंत नामक एक महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्ही कात्य के गोत्र में महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए कई वर्षो तक कठिन तपस्या की थी। इनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म ले। मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की। दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रम्हा, विष्णु, महेश तीनो ने अपने अपने तेज के अंश द्वारा महिषासुर के विनाश के लिए देवी महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाई। मां कात्यायनी ने दशमी को महिषासुर का वध किया था। इनका स्वरूप अत्यंत चमकीला भास्कर है। इनकी चार भुजाएं है। माता जी का दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बायी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। आज नगर की अधिष्ठात्री मां बेल्हा देवी में तड़के से ही पूजन अर्चन के लिए कतार लग गई। इसके बाद देर रात तक पूजन अर्चन का क्रम चलता रहा। मां का जयकारा करते लोग पूजन करने के लिए उतावले दिख रहे थे। बलीपुर स्थित दुर्गा मंदिर पर भी काफी लोगो की भीड़ सुबह से जुटने लगी। यही हाल मां चन्द्रिका धाम, मां ज्वाला देवी एवं मां बाराही देवी धाम का भी था। इसके अलावा दहिलामऊ की चन्द्रिका मंदिर सेनानी नगर की मां सर्वेश्वरी मंदिर आदि में लोगो ने विधि विधान के साथ मां की पूजा आराधना की। उधर पूजा पाण्डालो में भी आज काफी भीड़ रही। सुबह शाम दोनो समय पूजन एवं आरती की धूम रही। उधर पूजा पाण्डालो में मां की मनोहारी प्रतिमाएं स्थापित की गई है। लोग शाम होते ही पूजा पाण्डालो की सजावट देखने निकल पड़ते है। साथ ही पूजन व आरती में शामिल होकर तथा प्रसाद ग्रहण करके ही घर जाते है। इतना ही नहीं यह मां भवानी के पूजन का दिन है, इसका एहसास पूजा पाण्डालो में बजने वाले देवी गीत भी करा रहे है। तमाम पूजा पाण्डालो में महिलाएं भी भजन गाकर वातावरण को देवीमय बना रही ह। कुल मिलाकर दिन हो या रात सब कुछ देवीमय दिख रहा है।



उत्तरप्रदेश








शेयर करें








































































