अलग अलग पुराणों में वर्णित है कि मथुरा में भगवान कृष्ण का अवतार लेना बृजभूमि की सबसे शुभ एंव सुखद घटना है। कृष्ण का जन्म कंस की जेल में हुआ था। श्रीमद्भागवत पुराण, वाराह पुराण आदि आदि। समय बीतने के साथ कृष्ण के जन्म लेने की जगह और आस पास के क्षेत्र को कटरा केशवदेव” के नाम से जाना जाने लगा। ब्राह्मी लिपि में पत्थरों पर लिखे गए “महाभाषा षोडश” के अनुसार वासु नाम के एक व्यक्ति ने श्री कृषण के जन्म स्थान पर बलि वेदी का निर्माण करवाया। सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन के दौरान इस मंदिर का पुनः निर्माण कराया गया। मीर मुंशी अल उताबी,जो की गजनी का सिपहसलार था ने तारीख-इ-यमिनी में लिखा है,शहर के बीचो बीच एक भव्य मंदिर मोजूद है जिसे देखने पर लगता है की इसका निर्माण फरिश्तो ने कराया होगा। इस मंदिर का वर्णन शब्दों एंव चित्रों में करना नामुमकिन है। सुल्तान खुद कहता है की अगर कोई इस भव्य मंदिर को बनाना चाहे तो कम से कम १० करोड़ दीनार और २०० साल लगेंगे। फ्रांस एंव इटली से आये विदेशी यात्रियों ने इस मंदिर की व्याख्या अपनी लेखनियो में सुरुचिपूर्ण और वास्तुशास्त्र के एक अतुल्य एंव अदभुत कीर्तिमान के रूप में की। वो आगे लिखते है की इस मंदिर की बाहरी त्वचा सोने से ढकी हुई थी और यह इतना ऊँचा था की ३६ मील दूर आगरा से भी दिखाई देता था। इस मंदिर की हिन्दू समाज में ख्याति देखकर औरंगजेब नाराज हो गया। जिसके कारण उसने सन१६६९ में इस मंदिर को तुडवा दिया। वह इस मंदिर से इतना चिढ़ा हुआ था कि उसने मंदिर से प्राप्त अवशेषों से अपने लिए एक विशाल कुर्सी बनाने का आदेश दिया है। उसने कृष्ण जन्मभूमि पर ईदगाह बनाने का भी आदेश दिया है।
*कानूनी साक्ष्य*
मथुरा नगर पालिका वर्तमान में नगर निगम के बही खातो तथा दूसरे साक्ष्यों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है की कटरा केशवदेव जिसमे ईदगाह भी शामिल है का ,लैंड टैक्स श्रीकृष्ण जन्मभूमि संस्था द्वारा ही दिया जाता है। इससे यह साबित होता है की विवादित जमीन पर केवल इसी ट्रस्ट का अधिकार है”।
अर्थात:- चित्र मे दिख रहा विवादित इस्लामिक ढाँचा ही वास्तविक कृष्णजन्मभूमि है, उसके निकट हिन्दुओं ने मदनमोहन मालवीय जी के सहयोग से एक भागवत भवन का निर्माण कर रखा है ताकि पूजा अर्चना चलती रहे और 17.34 एकड़ भूमि में से कुछ भूमि तो हिन्दुओं के अधिकार में रहे।



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