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जनपद में बढ़ा आवारा पशुओ एवं नीलगायो का आतंक

किसानो की मेहनत पर पानी फेर रहे पशु
प्रतापगढ़ (ब्यूरो) जनपद में नगर आसपास जहां आवारा पशुओ का आतंक बढ़ा हुआ है। वही ग्रामीण क्षेत्रो में नीलगायों के कहर से किसान परेशान है। नीलगाय आवारा मवेशी खड़ी फसल चैपट करके किसानो की कमर तोड़ रहे है। नीलगाय की समस्या तो ऐसी है कि जिस का किसी के पास कोई इलाज नहीं है। बताते चले कि किसान रात दिन मेहनत करके अपनी फसल तैयार करता है। फसल में फल फूल आने लगता है तो एक दिन खेत पर आवारा मवेशियों तथा नीलगायों का हमला हो जाता है। इससे घण्टे भर में उनकी फसल चैपट हो जाती है। साथ ही उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है। फसल में यदि कोई बीमारी लगती हैं तो उसके रोकथाम के लिए कुछ समय होता है। साथ ही आधी या तिहाई फसल बच जाती है। लेकिन नीलगाय के हमले से कुछ नहीं बचता है। जो बचता भी है उसे आवारा मवेशी चट कर जाते है। खास बात यह है कि नील गाय हमेशा झुण्ड में चलते है। दिन के समय नदियो एवं नालो के किनारे झाड़ियो और पेड़ो के नीचे विश्राम करते है। शाम होते ही ये पांच से लेकर तीस के झुण्ड में निकलते है तथा जिस खेत में घुसते है उसकी फसल, फल फूल को खाते ही है। साथ ही रौंदकर पूरी तरह चैपट कर देते हैं ये फलने फूलने वालो फसलो की ओर ज्यादा आकर्षित होते है कोई भी फसल इनके लिए अरूचिकर नहीं होती। यहां तक मिर्च की फूल लगी फसल भी चट कर जाते है। जबकि आवारा मवेशियो से हर समय फसल के लिए खतरा बना रहता है। वैसे नील गाय से खेती बारी का नुकसान कोई नई बात नहीं है। वही इनका विस्तार ज्यादा हानिकारक हो रहा है। पहले यह समस्या जंगलो के निकट तक के गांवो तक ही सीमित थी लेकिन अब सर्वव्यापी हो गई है। नीलगाय अपने छुपने के साथ से 15 या 20 किमी. तक चारो ओर हमला कर सकते है। नीलगाय में गाय शब्द जुड़ा होने से आम आदमी इसे गाय का वंशज मानता है। इसे तो मारता है और किसी को मारने देता है। जबकि वास्तविकता यह है कि यह गाय का वंशज नहीं है। यह बकरी और हिरन के बीच की प्रजाति है। नीलगायो से फसल की सुरक्षा का कार्य बहुत कठिन होता है। उधर आवारा मवशी भी फसलो के दुश्मन बने हुए है। हालत यह है कि खेत की रखवाली कर रहे किसान को झपकी आते ही फसल चैपट हो जाती है। नीलगायो तथा आवारा मवेशियों से फसल को बचाने के लिए गांवो में किसान पटाखे छुड़ाने के साथ ही रोशनी करने तथा कटीले तार की बाड़ लगाने की तरकीब अपनाते है। वही कटीला तार लगाना इतना खर्चीला होता है कि ऐसी व्यवस्था कुछ किसान ही कर पाते है। खेती के लिए सरकार चाहे जितने प्रयास करे लेकिन नीलगाय तथा आवारा मवेशियो की समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। इससे किसानो की मेहनत पर यह पशु पानी फेर रहे है।

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किसानो की मेहनत पर पानी फेर रहे पशु
प्रतापगढ़ (ब्यूरो) जनपद में नगर आसपास जहां आवारा पशुओ का आतंक बढ़ा हुआ है। वही ग्रामीण क्षेत्रो में नीलगायों के कहर से किसान परेशान है। नीलगाय आवारा मवेशी खड़ी फसल चैपट करके किसानो की कमर तोड़ रहे है। नीलगाय की समस्या तो ऐसी है कि जिस का किसी के पास कोई इलाज नहीं है। बताते चले कि किसान रात दिन मेहनत करके अपनी फसल तैयार करता है। फसल में फल फूल आने लगता है तो एक दिन खेत पर आवारा मवेशियों तथा नीलगायों का हमला हो जाता है। इससे घण्टे भर में उनकी फसल चैपट हो जाती है। साथ ही उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है। फसल में यदि कोई बीमारी लगती हैं तो उसके रोकथाम के लिए कुछ समय होता है। साथ ही आधी या तिहाई फसल बच जाती है। लेकिन नीलगाय के हमले से कुछ नहीं बचता है। जो बचता भी है उसे आवारा मवेशी चट कर जाते है। खास बात यह है कि नील गाय हमेशा झुण्ड में चलते है। दिन के समय नदियो एवं नालो के किनारे झाड़ियो और पेड़ो के नीचे विश्राम करते है। शाम होते ही ये पांच से लेकर तीस के झुण्ड में निकलते है तथा जिस खेत में घुसते है उसकी फसल, फल फूल को खाते ही है। साथ ही रौंदकर पूरी तरह चैपट कर देते हैं ये फलने फूलने वालो फसलो की ओर ज्यादा आकर्षित होते है कोई भी फसल इनके लिए अरूचिकर नहीं होती। यहां तक मिर्च की फूल लगी फसल भी चट कर जाते है। जबकि आवारा मवेशियो से हर समय फसल के लिए खतरा बना रहता है। वैसे नील गाय से खेती बारी का नुकसान कोई नई बात नहीं है। वही इनका विस्तार ज्यादा हानिकारक हो रहा है। पहले यह समस्या जंगलो के निकट तक के गांवो तक ही सीमित थी लेकिन अब सर्वव्यापी हो गई है। नीलगाय अपने छुपने के साथ से 15 या 20 किमी. तक चारो ओर हमला कर सकते है। नीलगाय में गाय शब्द जुड़ा होने से आम आदमी इसे गाय का वंशज मानता है। इसे तो मारता है और किसी को मारने देता है। जबकि वास्तविकता यह है कि यह गाय का वंशज नहीं है। यह बकरी और हिरन के बीच की प्रजाति है। नीलगायो से फसल की सुरक्षा का कार्य बहुत कठिन होता है। उधर आवारा मवशी भी फसलो के दुश्मन बने हुए है। हालत यह है कि खेत की रखवाली कर रहे किसान को झपकी आते ही फसल चैपट हो जाती है। नीलगायो तथा आवारा मवेशियों से फसल को बचाने के लिए गांवो में किसान पटाखे छुड़ाने के साथ ही रोशनी करने तथा कटीले तार की बाड़ लगाने की तरकीब अपनाते है। वही कटीला तार लगाना इतना खर्चीला होता है कि ऐसी व्यवस्था कुछ किसान ही कर पाते है। खेती के लिए सरकार चाहे जितने प्रयास करे लेकिन नीलगाय तथा आवारा मवेशियो की समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। इससे किसानो की मेहनत पर यह पशु पानी फेर रहे है।

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