प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। शरीर को स्वस्थ्य एवं बलिष्ठ रखने वाला गांवो का अखाड़ा आधुनिकता की चकाचैंध में गुम हो गया है। मिट्टी और अखाड़े की कुश्ती अब गद्दो पर होने लगी है। समय की भेट चढ़ी मिट्टी के अखाड़ो में न तो ढोल की थाप सुनाई देती है और न ही युवको का गठीला बदन दिखाई देता है। युवको पर फिल्मो का प्रभाव एवं आधुनिकता के कारण कुश्ती से दूर होता युवा वर्ग जिम जाना पसंद करने लगा है। गौरतलब है कि ग्रामीण युवक भी अब कुश्ती को गुजरे जमाने की बात मानकर जिम जाने में अधिक रूचि ले रहे है। हालत यह है कि कस्बो में भी जिम खुलने लगा है। दारा सिंह व गामा पहलवान युवको के आदर्श न होकर फिल्मी हीरो एवं क्रिकेटर बनने लगे है। कुश्ती के प्रति युवाओं के घटते आकर्षण पर बुजुर्गाे का कहना है कि पहलवानी का शौक धीरे धीरे बढ़ते जिम्मेदारियो में खोक रह गया है। उनका कहना है कि अन्य खेलो की तरह कुश्ती का भविष्य न देखकर युवा अब दूसरे खेल पसंद करने लगे है। हालांकि कुछ पहलवान अब भी राष्ट्रीय स्तर पर अपने दांव पेच का परचम लहरा रहे है। जानकारो का कहना है कि पहले के लोग स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहते थे। वैमनस्यता एक तरफ रखकर अखाड़े में जोर आजमाइश होती थी। मिट्टी के अखाडे़ खत्म होने में युवाओ का गांवो से पलायन ही मुख्य कारण है। आर्थिक कारण भी युवा आज कुश्ती से दूर हो रहे है। कुश्ती का स्वरूप और मिट्टी के अखाड़े का भविष्य न होने के कारण लोगो की रूचि घटने लगी है।
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। शरीर को स्वस्थ्य एवं बलिष्ठ रखने वाला गांवो का अखाड़ा आधुनिकता की चकाचैंध में गुम हो गया है। मिट्टी और अखाड़े की कुश्ती अब गद्दो पर होने लगी है। समय की भेट चढ़ी मिट्टी के अखाड़ो में न तो ढोल की थाप सुनाई देती है और न ही युवको का गठीला बदन दिखाई देता है। युवको पर फिल्मो का प्रभाव एवं आधुनिकता के कारण कुश्ती से दूर होता युवा वर्ग जिम जाना पसंद करने लगा है। गौरतलब है कि ग्रामीण युवक भी अब कुश्ती को गुजरे जमाने की बात मानकर जिम जाने में अधिक रूचि ले रहे है। हालत यह है कि कस्बो में भी जिम खुलने लगा है। दारा सिंह व गामा पहलवान युवको के आदर्श न होकर फिल्मी हीरो एवं क्रिकेटर बनने लगे है। कुश्ती के प्रति युवाओं के घटते आकर्षण पर बुजुर्गाे का कहना है कि पहलवानी का शौक धीरे धीरे बढ़ते जिम्मेदारियो में खोक रह गया है। उनका कहना है कि अन्य खेलो की तरह कुश्ती का भविष्य न देखकर युवा अब दूसरे खेल पसंद करने लगे है। हालांकि कुछ पहलवान अब भी राष्ट्रीय स्तर पर अपने दांव पेच का परचम लहरा रहे है। जानकारो का कहना है कि पहले के लोग स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहते थे। वैमनस्यता एक तरफ रखकर अखाड़े में जोर आजमाइश होती थी। मिट्टी के अखाडे़ खत्म होने में युवाओ का गांवो से पलायन ही मुख्य कारण है। आर्थिक कारण भी युवा आज कुश्ती से दूर हो रहे है। कुश्ती का स्वरूप और मिट्टी के अखाड़े का भविष्य न होने के कारण लोगो की रूचि घटने लगी है।



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