अब सावन के महीने में नहीं सुनाई पड़ते कजरी के गीत
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। सावन का महीना लगते ही गांवो के गली कूचो में महिलाओ द्वारा गाये जाने वाले कजरी गीत अब नहीं सुनाई पड़ते। बदले परिवेश में कजरी के त्योहार को मनाने का ढंग भी बदल गया है। सावन महीने में बागो में पेड़ो की डालो पर पड़ने वाले झूले भी अब नहीं दिखाई पड़ते। झूला झूलती महिलाओ द्वारा अपने कोकिल कंठ से गाये जाने वाले कजरी के गीत अब नहीं सुनाई देते।
बताते चले कि पहले कजरी गीत पूरे सावन माह तक महिलाएं गाती हुई दिखाई पड़ती थी। झूला झूलते समय ही नहीं महिलाएं खेत खलिहानो में काम करते समय भी कजरी के बोल गुनगुनाती रहती थी। बच्चे, बूढ़े, नवजवान भी कजरी का त्योहार बड़ी धूमधाम के साथ मनाया करते थे। जब महिलाएं धान की रोपाई कर रही होती थी तो कजरी की लहरी सुनने के लिए आसपास के लोग आ जाया करते थे। वही यह पारंपरिक गीत अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है। सावन महीने में ग्रामीणांचल में कजरी की धूम रहती थी। पेड़ की डाल पर पड़े झूले पर बैठकर महिलाएं जब कजरी गीत गाना शुरू करती थी तो आसपास के लोग घण्टो वहां मौजूद रहकर गीतो का आनन्द उठाया करते थे। वही अब यह गीत धीरे धीरे गायब होते जा रहे है। लोग कजरी के गीत सुनने को भी तरसने लगे है। आधुनिक मनोरंजन के संसाधनो ने पुरानी परम्पराओ एवं रीति रिवाजो को निगलना शुरू कर दिया है। अब लोग आधुनिक भौड़े गीत सुनने लगे है। इस समय महिलाएं कजरी के अलावा अन्य पारम्परिक गीत गाना छोड़ चुकी है। कजरी की एक धुन हरे रामा सावन की बरसे बदरिया सजन नहीं आए रे हारी… जैसे श्रृंगाररस से परिपूर्ण गानो की लोग कभी गुनगुनाते भी नहीं दिखाई देते। हालांकि आज भी कजरी के अलावा गांवो में पर्व पर गाए जाने वाले उठान वियोग एवं श्रृंगार के गाने जो कि धरोहर के रूप में बुजुर्ग महिलाओ के पास पड़ी है। उसे सीखने के लिए आज की पीढ़ी उनके पास नहीं बैठना चाहती। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब कजरी का वजूद ही समाप्त हो जाएगा। ऐसे में हमे अपने परम्परागत गीतो के अस्तित्व को बनाए रखना है। साथ ही अपने बुजुर्गो से उन गीतो को धरोहर को रूप में अपनाना होगा।
अब सावन के महीने में नहीं सुनाई पड़ते कजरी के गीत
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। सावन का महीना लगते ही गांवो के गली कूचो में महिलाओ द्वारा गाये जाने वाले कजरी गीत अब नहीं सुनाई पड़ते। बदले परिवेश में कजरी के त्योहार को मनाने का ढंग भी बदल गया है। सावन महीने में बागो में पेड़ो की डालो पर पड़ने वाले झूले भी अब नहीं दिखाई पड़ते। झूला झूलती महिलाओ द्वारा अपने कोकिल कंठ से गाये जाने वाले कजरी के गीत अब नहीं सुनाई देते।
बताते चले कि पहले कजरी गीत पूरे सावन माह तक महिलाएं गाती हुई दिखाई पड़ती थी। झूला झूलते समय ही नहीं महिलाएं खेत खलिहानो में काम करते समय भी कजरी के बोल गुनगुनाती रहती थी। बच्चे, बूढ़े, नवजवान भी कजरी का त्योहार बड़ी धूमधाम के साथ मनाया करते थे। जब महिलाएं धान की रोपाई कर रही होती थी तो कजरी की लहरी सुनने के लिए आसपास के लोग आ जाया करते थे। वही यह पारंपरिक गीत अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है। सावन महीने में ग्रामीणांचल में कजरी की धूम रहती थी। पेड़ की डाल पर पड़े झूले पर बैठकर महिलाएं जब कजरी गीत गाना शुरू करती थी तो आसपास के लोग घण्टो वहां मौजूद रहकर गीतो का आनन्द उठाया करते थे। वही अब यह गीत धीरे धीरे गायब होते जा रहे है। लोग कजरी के गीत सुनने को भी तरसने लगे है। आधुनिक मनोरंजन के संसाधनो ने पुरानी परम्पराओ एवं रीति रिवाजो को निगलना शुरू कर दिया है। अब लोग आधुनिक भौड़े गीत सुनने लगे है। इस समय महिलाएं कजरी के अलावा अन्य पारम्परिक गीत गाना छोड़ चुकी है। कजरी की एक धुन हरे रामा सावन की बरसे बदरिया सजन नहीं आए रे हारी… जैसे श्रृंगाररस से परिपूर्ण गानो की लोग कभी गुनगुनाते भी नहीं दिखाई देते। हालांकि आज भी कजरी के अलावा गांवो में पर्व पर गाए जाने वाले उठान वियोग एवं श्रृंगार के गाने जो कि धरोहर के रूप में बुजुर्ग महिलाओ के पास पड़ी है। उसे सीखने के लिए आज की पीढ़ी उनके पास नहीं बैठना चाहती। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब कजरी का वजूद ही समाप्त हो जाएगा। ऐसे में हमे अपने परम्परागत गीतो के अस्तित्व को बनाए रखना है। साथ ही अपने बुजुर्गो से उन गीतो को धरोहर को रूप में अपनाना होगा।



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