हाल ही मे पत्रकारिता के उपलक्ष्य मे भारत देश के एक पत्रकार को अफगानिस्तान भेजा गया वहां होने वाले युद्ध के विषय मे बस खबरें बटोरना ही न्यूज चैनल अखबारों का उद्देश्य था।ताकी ज्यादा से ज्यादा गहमागहमी नरमानरमी भरी खबरों को ज्यादा से ज्यादा प्रकाशित कर या चैनलों पर प्रसारित कर बस टीआरपी बटोरना ही उद्देश्य होता है।परंतु उस पत्रकार के बारे मे सोचो जो पल-पल अपनी जान हथेली मे लेकर खबरों को बटोरता है।जिसमें एक पल मे उसके साथ क्या हो जाऐ कोई कुछ नहीं कह सकता शायद पत्रकार जो समाज मे घूंम कर घटनास्थल की जांच कर खबर बनाता वो घर से रोज़ कहकर निकलता हो की हो सकता है मैं परिवार को आखरी बार देख रहा हूं शाम को लौट के वापस आ पाऊँगा की नही।हाल ही मे अफगानिस्तान की कवरेज न्यूज़ बनाने के लिये पत्रकार पुलित्ज़र विजेता दानिश जी की हत्या काबुल कंधार मे कर दी गई।ऐसे ही कुछ दिन पहले एक पत्रकार शलभ श्रीवास्तव जी की भी पत्रकारिता के चलते हत्या कर दी गई थी।ये पत्रकार अपनी जान जोखिम मे डाल कर चले जाते उन जगहों पर जहां उन्हें पहले से ही खतरा रहता है पर क्या करें पत्रकारिता इनका पेशा है और ये बस मुलाज़िम है।इन्हें कब और कहां भेज दिया जाऐ कुछ नहीं कह सकते।दानिश जी भी अपना मुलाज़िम होने का फर्ज़ ही तो निभा रहे थे वो अपनी ड्यूटी बजाते हुए बस मौत के खौफनाक मंज़र के साऐ मे रह अफगानिस्तान की खबरों से अपनी कम्पनी को रुबरू करा रहे थे बस फिर क्या जब किसी खबर पे काबुल कंधार वालों को आपत्ति लगी तो विदेशी जासूस कह साधारण से पत्रकार को सुला दिया मौत के घाट मिडिया ने तो जो सुर्खी टीआरपी बटोरनी थी बटोर ली अब दानिश की मौत को भी टीआरपी के लिये इस्तेमाल कर बना देंगे खबर और बस उसे श्रद्धांजलि देते हुए एक वीर पत्रकार का तमगा उनके घर वालों को थमा दिया जाऐगा।कुछ रुपये भी शायद संग मे थमा दिये जाऐं।परंतु जब पहले से ही पता है की कौन सा मुलक कितना खतरनाक है वहां किसी को भेजना चाहिये या नहीं ये सोचविचार करना चाहिये महज़ अपने पत्रकार की अधिक बिक्री और टीआरपी बटोरने के लिये ये कहाँ तक उचित की उसे जानबूझकर मौत के मुंह मे धकेला जाऐ।पत्रकार मजबूर है क्यों कि उसे अपने घर के लोगों का पेट पालना है वो तो ना चाह कर भी ड्यूटी बजाऐगा बेमन से।कुछ दिन पहले ही समुद्र मे आऐ ताउते तूफान की खबर बनाने के लिये पत्रकारों को जब समुद्र के इतने करीब देख रही थी तो भी मन मे यही सवाल की जो पत्रकार सभी को हिदायत देते दिख रहे की घर से बाहर ना निकलें वो खुद सिर्फ अपने मालिक के लिये इतना मेहनत कर रहा है।उड़ते हुए छतों से टीन को देखा की कैसे रोड पे आकर गिरे गाड़ी वालो से टकराऐ और लोग गिरके जख्म़ी भी हुए जब आम जनता को इतना खतरा था तो आखिर पत्रकार को क्यों नही।क्या उसे अपनी जान की जरा सी भी परवाह नहीं है।उसे भी फिक्र होती है उसके परिवार वालों की भी सांस़े मिडिया पे देख अपने घर के सदस्य के लिये होती है।परंतु लाचारी का फायदा उठाते ये मिडिया वाले बस टीआरपी चाहिये इन्हें चाहे जान जाऐ तो जाऐ दूसरा पत्रकार मिल जाऐगा।बेरोजगारों की वैसे भी कमी थोड़ी है हमारे भारत देश मे।यहां इंसान की जान की कद्र नहीं बस टीआरपी बटोरनी है एक मोटी कमाई के लिये ताकी बस तिजोरी भरे चाहे किसी पत्रकार के खून से डूब कर।
हाल ही मे पत्रकारिता के उपलक्ष्य मे भारत देश के एक पत्रकार को अफगानिस्तान भेजा गया वहां होने वाले युद्ध के विषय मे बस खबरें बटोरना ही न्यूज चैनल अखबारों का उद्देश्य था।ताकी ज्यादा से ज्यादा गहमागहमी नरमानरमी भरी खबरों को ज्यादा से ज्यादा प्रकाशित कर या चैनलों पर प्रसारित कर बस टीआरपी बटोरना ही उद्देश्य होता है।परंतु उस पत्रकार के बारे मे सोचो जो पल-पल अपनी जान हथेली मे लेकर खबरों को बटोरता है।जिसमें एक पल मे उसके साथ क्या हो जाऐ कोई कुछ नहीं कह सकता शायद पत्रकार जो समाज मे घूंम कर घटनास्थल की जांच कर खबर बनाता वो घर से रोज़ कहकर निकलता हो की हो सकता है मैं परिवार को आखरी बार देख रहा हूं शाम को लौट के वापस आ पाऊँगा की नही।हाल ही मे अफगानिस्तान की कवरेज न्यूज़ बनाने के लिये पत्रकार पुलित्ज़र विजेता दानिश जी की हत्या काबुल कंधार मे कर दी गई।ऐसे ही कुछ दिन पहले एक पत्रकार शलभ श्रीवास्तव जी की भी पत्रकारिता के चलते हत्या कर दी गई थी।ये पत्रकार अपनी जान जोखिम मे डाल कर चले जाते उन जगहों पर जहां उन्हें पहले से ही खतरा रहता है पर क्या करें पत्रकारिता इनका पेशा है और ये बस मुलाज़िम है।इन्हें कब और कहां भेज दिया जाऐ कुछ नहीं कह सकते।दानिश जी भी अपना मुलाज़िम होने का फर्ज़ ही तो निभा रहे थे वो अपनी ड्यूटी बजाते हुए बस मौत के खौफनाक मंज़र के साऐ मे रह अफगानिस्तान की खबरों से अपनी कम्पनी को रुबरू करा रहे थे बस फिर क्या जब किसी खबर पे काबुल कंधार वालों को आपत्ति लगी तो विदेशी जासूस कह साधारण से पत्रकार को सुला दिया मौत के घाट मिडिया ने तो जो सुर्खी टीआरपी बटोरनी थी बटोर ली अब दानिश की मौत को भी टीआरपी के लिये इस्तेमाल कर बना देंगे खबर और बस उसे श्रद्धांजलि देते हुए एक वीर पत्रकार का तमगा उनके घर वालों को थमा दिया जाऐगा।कुछ रुपये भी शायद संग मे थमा दिये जाऐं।परंतु जब पहले से ही पता है की कौन सा मुलक कितना खतरनाक है वहां किसी को भेजना चाहिये या नहीं ये सोचविचार करना चाहिये महज़ अपने पत्रकार की अधिक बिक्री और टीआरपी बटोरने के लिये ये कहाँ तक उचित की उसे जानबूझकर मौत के मुंह मे धकेला जाऐ।पत्रकार मजबूर है क्यों कि उसे अपने घर के लोगों का पेट पालना है वो तो ना चाह कर भी ड्यूटी बजाऐगा बेमन से।कुछ दिन पहले ही समुद्र मे आऐ ताउते तूफान की खबर बनाने के लिये पत्रकारों को जब समुद्र के इतने करीब देख रही थी तो भी मन मे यही सवाल की जो पत्रकार सभी को हिदायत देते दिख रहे की घर से बाहर ना निकलें वो खुद सिर्फ अपने मालिक के लिये इतना मेहनत कर रहा है।उड़ते हुए छतों से टीन को देखा की कैसे रोड पे आकर गिरे गाड़ी वालो से टकराऐ और लोग गिरके जख्म़ी भी हुए जब आम जनता को इतना खतरा था तो आखिर पत्रकार को क्यों नही।क्या उसे अपनी जान की जरा सी भी परवाह नहीं है।उसे भी फिक्र होती है उसके परिवार वालों की भी सांस़े मिडिया पे देख अपने घर के सदस्य के लिये होती है।परंतु लाचारी का फायदा उठाते ये मिडिया वाले बस टीआरपी चाहिये इन्हें चाहे जान जाऐ तो जाऐ दूसरा पत्रकार मिल जाऐगा।बेरोजगारों की वैसे भी कमी थोड़ी है हमारे भारत देश मे।यहां इंसान की जान की कद्र नहीं बस टीआरपी बटोरनी है एक मोटी कमाई के लिये ताकी बस तिजोरी भरे चाहे किसी पत्रकार के खून से डूब कर।



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