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धूमधाम से मनाई गई होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति के जनक डॉक्टर सैमुअल हैनिमैन की जयंती

रोगी के मानसिक स्तर का अध्ययन किए बगैर सही दवाओं का चयन मुश्किल
लोकमित्र ब्यूरो
प्रयागराज। होम्योपैथिक दवाओं की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से प्राकृतिक हैं। इसे पशुओं, पौधों, खनिज के अवशेष और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से तैयार किया जाता है। इस पद्धति में शरीर के इम्यूनिटी सिस्टम को प्राकृतिक रूप से ठीक कर उपचार किया जाता है। उक्त बातें डॉ.(प्रो.) एसएम सिंह ने सिविल लाइंस स्थित एक होटल में होम्योपैथी के जनक जर्मन चिकित्सक सैमुअल हैनिमैन की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कहीं। उन्होंने कहाकि इस पद्धति में रोगी के न सिर्फ बीमारी बल्कि मानसिक स्तर का भी अध्ययन जरूरी है। इसके बाद ही सही दवा का चयन संभव है। डॉ. हैनिमैन की पुस्तक क्रोनिक डिजीज का हवाला देते हुए बताया उन्होंने लिखा है कि कुछ लोगों के परिवारों में उनकी बीमारी का मूल रूप होता है। दवाएं चलने के बाद भी यह मरीज को ठीक होने से लगातार रोकता है। इसलिए बीमारी को पूरी तरह से ठीक होना जरूरी है। होमियोपैथी के इतिहास की चर्चा करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि लगभग दो सौ साल पहले इसकी यात्रा आरंभ हुई थी। इसके खोजकर्ता जर्मन चिकित्सक डॉ. हैनिमैन रहे। यह पद्धति समरूपता के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें रोगी के शरीर में रोग के समान लक्षण उत्पन्न कर इलाज किया जाता है। एक ही दवा का अलग अलग व्यक्ति पर प्रभाव अलग है। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया में होम्योपैथी की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है। भारत में भी लोगों का विश्वास इस पद्धति के प्रति बढ़ रहा है। इसलिए दावे के साथ कहा जा सकता है कि भारत में भी इस चिकित्सा पद्धति का भविष्य उज्ज्वल है। उन्होंने भारत में भी होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति के विकास पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अन्य वक्ताओं ने भी डॉ. हैनिमैन को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों और चिकित्सकों ने होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति के जनक सैमुअल हैनिमैन के चित्र पर माल्यार्पण कर उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में चिकित्सक मौजूद थे।

रोगी के मानसिक स्तर का अध्ययन किए बगैर सही दवाओं का चयन मुश्किल
लोकमित्र ब्यूरो
प्रयागराज। होम्योपैथिक दवाओं की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से प्राकृतिक हैं। इसे पशुओं, पौधों, खनिज के अवशेष और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से तैयार किया जाता है। इस पद्धति में शरीर के इम्यूनिटी सिस्टम को प्राकृतिक रूप से ठीक कर उपचार किया जाता है। उक्त बातें डॉ.(प्रो.) एसएम सिंह ने सिविल लाइंस स्थित एक होटल में होम्योपैथी के जनक जर्मन चिकित्सक सैमुअल हैनिमैन की जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कहीं। उन्होंने कहाकि इस पद्धति में रोगी के न सिर्फ बीमारी बल्कि मानसिक स्तर का भी अध्ययन जरूरी है। इसके बाद ही सही दवा का चयन संभव है। डॉ. हैनिमैन की पुस्तक क्रोनिक डिजीज का हवाला देते हुए बताया उन्होंने लिखा है कि कुछ लोगों के परिवारों में उनकी बीमारी का मूल रूप होता है। दवाएं चलने के बाद भी यह मरीज को ठीक होने से लगातार रोकता है। इसलिए बीमारी को पूरी तरह से ठीक होना जरूरी है। होमियोपैथी के इतिहास की चर्चा करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि लगभग दो सौ साल पहले इसकी यात्रा आरंभ हुई थी। इसके खोजकर्ता जर्मन चिकित्सक डॉ. हैनिमैन रहे। यह पद्धति समरूपता के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें रोगी के शरीर में रोग के समान लक्षण उत्पन्न कर इलाज किया जाता है। एक ही दवा का अलग अलग व्यक्ति पर प्रभाव अलग है। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया में होम्योपैथी की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है। भारत में भी लोगों का विश्वास इस पद्धति के प्रति बढ़ रहा है। इसलिए दावे के साथ कहा जा सकता है कि भारत में भी इस चिकित्सा पद्धति का भविष्य उज्ज्वल है। उन्होंने भारत में भी होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति के विकास पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अन्य वक्ताओं ने भी डॉ. हैनिमैन को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों और चिकित्सकों ने होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति के जनक सैमुअल हैनिमैन के चित्र पर माल्यार्पण कर उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में चिकित्सक मौजूद थे।

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