आगरा। प्रदेश विधानसभा चुनावों में आगरा ग्रामीण सीट पर इस बार मुकाबला कड़ा होता नजर आ रहा है, पिछले चुनाव में 65 हजार से अधिक अंतर से जीत चुकी भारतीय जनता पार्टी इस बार जीत को लेकर आश्वस्त दिख रही है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में भाजपा आसानी से इस सीट को जीत पायेगी?। क्षेत्रीय मतदाताओं द्वारा ऐसे सवाल किए जा रहे हैं, जिसके जवाब भाजपा को देने होंगे। पहला सवाल यही है कि पिछले चुनाव में हेमलता दिवाकर कुशवाह को जिताने के बाद क्षेत्रीय जनता को क्या लाभ मिला? आरोप हैं कि चुनाव जीतने के बाद हेमलता अपने अधिकांश चुनाव क्षेत्र में पलट कर नहीं पहुंचीं। खुद भाजपा के आंतरिक सर्वे में यही बात उभर कर आई और हेमलता का टिकट काट दिया गया।
जनता का सवाल है कि क्या सिर्फ इसलिये भाजपा को वोट दे दें कि प्रत्याशी बदल गईं हैं? इस बात की क्या गारंटी है कि इस बार की भाजपा प्रत्याशी बेबीरानी मौर्य जीतने के बाद हेमलता का अनुसरण नहीं करेंगीं। क्या वे पूरे पांच साल क्षेत्र के विकास के लिए सक्रिय दिखाई देंगीं? उनका तो निवास भी छावनी क्षेत्र में है, कहीं जनता को उनसे मिल पाना भी दूभर तो नहीं हो जायेगा? देश के राजनीतिक इतिहास में शायद बेबीरानी पहली ऐसी शख्सियत हैं जो राज्यपाल के पद पर रहने के बाद विधायक का चुनाव लड़ रही हैं। वे उत्तराखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं। मतदाता ये भी जानना चाहते हैं कि आखिर उच्च पद पर रहने के बाद विधायक बनने की लालसा क्यों? क्या बेबीरानी राज्यपाल वाले आभामंडल से बाहर निकलकर सहज भाव से जनता से जुड़ी रह पायेंगी? कहीं उनसे मिल पाना भी दुश्वार तो नहीं हो जायेगा? पिछले चुनाव में भाजपा को मोदी लहर का लाभ मिला था। पार्टी इस बार भी मोदी-योगी के सहारे ही अपनी नैया पार लगाने की जुगत में है। लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि हेमलता से पहले यहां से बसपा के कालीचरन सुमन दो बार विधायक चुने गये थे। इसीलिए बेबीरानी मौर्य को न केवल चुनाव में जमकर मेहनत करनी होगी बल्कि जनता के भरोसे को भी जीतना होगा। कोविड नियमों के दायरे में रहते हए चुनाव प्रचार करने की बाध्यता भी इस चुनौती को कठिन बना रही है। ग्रामीण सीट पर बसपा से किरनप्रभा केसरी, कांग्रेस से उपेंद्र सिंह, सपा रालोद गठबंधन से महेश जाटव मैदान में हैं। आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी अरुण कठेरिया भी मैदान में हैं। वे तीन बार के सांसद रहे प्रभुदयाल कठेरिया के पुत्र हैं। दलित बाहुल्य इस सीट पर 23 प्रतिशत आबादी एससी वोटरों की है। जिसे बसपा का कोर वोट बैंक माना जाता है। इस क्षेत्र में बरौली अहीर, अकोला, बिचपुरी, धनौली अजीजपुर और नैनाना जाट छह ग्राम पंचायतें हैं। इनमें दलित (जाटव) और जाट दोनों समाज के अलग-अलग करीब 70 से 75 हजार वोट हैं। इसके अलावा बरौली अहीर और अजीजपुर आदि में यादव, लोधी, कुशवाह समेत कई पिछड़ी जातियों की आबादी है। इस बार रालोद-सपा गठबंधन के चलते जाट वोट बैंक में रालोद ने सेंधमारी की है। इन सभी परिस्थितियों से भाजपा की बेबीरानी मौर्य किस प्रकार उबर कर आती हैं, यही देखने वाली बात होगी।
आगरा। प्रदेश विधानसभा चुनावों में आगरा ग्रामीण सीट पर इस बार मुकाबला कड़ा होता नजर आ रहा है, पिछले चुनाव में 65 हजार से अधिक अंतर से जीत चुकी भारतीय जनता पार्टी इस बार जीत को लेकर आश्वस्त दिख रही है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में भाजपा आसानी से इस सीट को जीत पायेगी?। क्षेत्रीय मतदाताओं द्वारा ऐसे सवाल किए जा रहे हैं, जिसके जवाब भाजपा को देने होंगे। पहला सवाल यही है कि पिछले चुनाव में हेमलता दिवाकर कुशवाह को जिताने के बाद क्षेत्रीय जनता को क्या लाभ मिला? आरोप हैं कि चुनाव जीतने के बाद हेमलता अपने अधिकांश चुनाव क्षेत्र में पलट कर नहीं पहुंचीं। खुद भाजपा के आंतरिक सर्वे में यही बात उभर कर आई और हेमलता का टिकट काट दिया गया।
जनता का सवाल है कि क्या सिर्फ इसलिये भाजपा को वोट दे दें कि प्रत्याशी बदल गईं हैं? इस बात की क्या गारंटी है कि इस बार की भाजपा प्रत्याशी बेबीरानी मौर्य जीतने के बाद हेमलता का अनुसरण नहीं करेंगीं। क्या वे पूरे पांच साल क्षेत्र के विकास के लिए सक्रिय दिखाई देंगीं? उनका तो निवास भी छावनी क्षेत्र में है, कहीं जनता को उनसे मिल पाना भी दूभर तो नहीं हो जायेगा? देश के राजनीतिक इतिहास में शायद बेबीरानी पहली ऐसी शख्सियत हैं जो राज्यपाल के पद पर रहने के बाद विधायक का चुनाव लड़ रही हैं। वे उत्तराखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं। मतदाता ये भी जानना चाहते हैं कि आखिर उच्च पद पर रहने के बाद विधायक बनने की लालसा क्यों? क्या बेबीरानी राज्यपाल वाले आभामंडल से बाहर निकलकर सहज भाव से जनता से जुड़ी रह पायेंगी? कहीं उनसे मिल पाना भी दुश्वार तो नहीं हो जायेगा? पिछले चुनाव में भाजपा को मोदी लहर का लाभ मिला था। पार्टी इस बार भी मोदी-योगी के सहारे ही अपनी नैया पार लगाने की जुगत में है। लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि हेमलता से पहले यहां से बसपा के कालीचरन सुमन दो बार विधायक चुने गये थे। इसीलिए बेबीरानी मौर्य को न केवल चुनाव में जमकर मेहनत करनी होगी बल्कि जनता के भरोसे को भी जीतना होगा। कोविड नियमों के दायरे में रहते हए चुनाव प्रचार करने की बाध्यता भी इस चुनौती को कठिन बना रही है। ग्रामीण सीट पर बसपा से किरनप्रभा केसरी, कांग्रेस से उपेंद्र सिंह, सपा रालोद गठबंधन से महेश जाटव मैदान में हैं। आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी अरुण कठेरिया भी मैदान में हैं। वे तीन बार के सांसद रहे प्रभुदयाल कठेरिया के पुत्र हैं। दलित बाहुल्य इस सीट पर 23 प्रतिशत आबादी एससी वोटरों की है। जिसे बसपा का कोर वोट बैंक माना जाता है। इस क्षेत्र में बरौली अहीर, अकोला, बिचपुरी, धनौली अजीजपुर और नैनाना जाट छह ग्राम पंचायतें हैं। इनमें दलित (जाटव) और जाट दोनों समाज के अलग-अलग करीब 70 से 75 हजार वोट हैं। इसके अलावा बरौली अहीर और अजीजपुर आदि में यादव, लोधी, कुशवाह समेत कई पिछड़ी जातियों की आबादी है। इस बार रालोद-सपा गठबंधन के चलते जाट वोट बैंक में रालोद ने सेंधमारी की है। इन सभी परिस्थितियों से भाजपा की बेबीरानी मौर्य किस प्रकार उबर कर आती हैं, यही देखने वाली बात होगी।



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