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प्रबोधिनी एकादशी आज, पूजन सामग्री की हुई खरीददारी

बाजारो में रही चहल पहल
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। प्रबोधिनी एकादशी कल सोमवार को है। बाजारो में पूजन सामग्री की दुकाने सजी हुई है। वहां पर आज खरीददारो की भीड़ रही। इससे बाजारो में काफी चहल पहल दिखाई पड़ी। हालांकि सामानो पर हंगाई का असर साफ दिखाई दे रहा है। ग्रामीण क्षेत्रो में इस पर्व को लेकर अधिक उल्लास दिख रहा है। मान्यता है कि प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी शेष शैय्या से योग निद्रा से जाग जाते है। इसी दिन से सभी मंगल कार्य भी शुरू हो जाते है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवउठनी एकादशी के नाम से पूजनीय मानी जाती है। शास्त्रो में इस एकादशी को अनेक नामो से सम्बोधित किया गया है। इसमें प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी देवठान एकादशी आदि प्रमुख रूप से उल्लिखित है। आध्यात्मिक मान्यताओ के अनुरूप यह विश्वास किया जाता है कि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्षा की हरिशयनी एकादशी को शयन प्रारम्भ करने वाले भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी को जागृत हो जाते है। इस तिथि से ही सारे शुभ काम जैसे विवाह, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य होने शुरू हो जात है। एकादशी के दिन शालिग्राम से तुलसी का विवाह भी किया जाता है। वास्तव में देव सोने और देव जागने का अंतरंग सम्बंध सूर्य वंदना से है। आज भी सृष्टि की क्रियाशीलता सूर्य देव पर निर्भर है। हमारी दैनिक व्यवस्थाएं सूर्योदय से निर्धारित होती है। प्रकाश पुंज होने के कारण सूर्य देवता को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है। वजह प्रकाश ही परमेश्वर है। इसलिए देवउठनी एकादशी पर विष्णु भगवान सूर्य के रूप से पूजे जाते है। यह प्रकाश और ज्ञान की पूजा है। वेद माता गायत्री भी तो प्रकाश की ही प्रार्थना है। प्रबोधिनी एकादशी वास्तव में उसी विश्व स्वरूप की आराधना है। जो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करने के बाद दिखाया था। यह परमात्मा के अखण्ड तेजोमय स्वरूप की आराधना है क्योकि परमात्मा ने जब सृष्टि का सृजन किया तब उनके पास कोई सामान नहीं था। जब शरद ऋतु आती है तब बाद छंट जाते है। आसमान साफ हो जाता है। सूर्य भगवान नियमित दर्शन देने लगते है। इस तरह उन्हे प्रबोधित चैतन्य व जागृत माना जाता है। यही कारण है कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष एकादशी को देव उठने का पर्व मनाया जाता है। यह समस्त मंगल कार्यो की शुरूआत का दिन, पवित्र नदियो में स्नान व भगवान विष्णु के पूजन का विशेष महत्व है। पुण्य आदि करने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। इस वृत को करने से जन्म जन्मांतर के पाप क्षीण हो जाते है। साथ ही जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। इसदिन गन्ना, अनार केला सिंघाड़ा आदि ऋतु फल भगवान विष्णु को अर्पण करना चाहिए। विष्णु जी का चरणामृत पीने से पुनर्जन्म नहीं होता। पूजन के समय ताम्र पात्र में शालिग्राम का गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। उसमें तुलसीदल, केशर, चंदन आदि का भी मिश्रण होता है।

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बाजारो में रही चहल पहल
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। प्रबोधिनी एकादशी कल सोमवार को है। बाजारो में पूजन सामग्री की दुकाने सजी हुई है। वहां पर आज खरीददारो की भीड़ रही। इससे बाजारो में काफी चहल पहल दिखाई पड़ी। हालांकि सामानो पर हंगाई का असर साफ दिखाई दे रहा है। ग्रामीण क्षेत्रो में इस पर्व को लेकर अधिक उल्लास दिख रहा है। मान्यता है कि प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी शेष शैय्या से योग निद्रा से जाग जाते है। इसी दिन से सभी मंगल कार्य भी शुरू हो जाते है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवउठनी एकादशी के नाम से पूजनीय मानी जाती है। शास्त्रो में इस एकादशी को अनेक नामो से सम्बोधित किया गया है। इसमें प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी देवठान एकादशी आदि प्रमुख रूप से उल्लिखित है। आध्यात्मिक मान्यताओ के अनुरूप यह विश्वास किया जाता है कि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्षा की हरिशयनी एकादशी को शयन प्रारम्भ करने वाले भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी को जागृत हो जाते है। इस तिथि से ही सारे शुभ काम जैसे विवाह, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य होने शुरू हो जात है। एकादशी के दिन शालिग्राम से तुलसी का विवाह भी किया जाता है। वास्तव में देव सोने और देव जागने का अंतरंग सम्बंध सूर्य वंदना से है। आज भी सृष्टि की क्रियाशीलता सूर्य देव पर निर्भर है। हमारी दैनिक व्यवस्थाएं सूर्योदय से निर्धारित होती है। प्रकाश पुंज होने के कारण सूर्य देवता को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है। वजह प्रकाश ही परमेश्वर है। इसलिए देवउठनी एकादशी पर विष्णु भगवान सूर्य के रूप से पूजे जाते है। यह प्रकाश और ज्ञान की पूजा है। वेद माता गायत्री भी तो प्रकाश की ही प्रार्थना है। प्रबोधिनी एकादशी वास्तव में उसी विश्व स्वरूप की आराधना है। जो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करने के बाद दिखाया था। यह परमात्मा के अखण्ड तेजोमय स्वरूप की आराधना है क्योकि परमात्मा ने जब सृष्टि का सृजन किया तब उनके पास कोई सामान नहीं था। जब शरद ऋतु आती है तब बाद छंट जाते है। आसमान साफ हो जाता है। सूर्य भगवान नियमित दर्शन देने लगते है। इस तरह उन्हे प्रबोधित चैतन्य व जागृत माना जाता है। यही कारण है कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष एकादशी को देव उठने का पर्व मनाया जाता है। यह समस्त मंगल कार्यो की शुरूआत का दिन, पवित्र नदियो में स्नान व भगवान विष्णु के पूजन का विशेष महत्व है। पुण्य आदि करने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। इस वृत को करने से जन्म जन्मांतर के पाप क्षीण हो जाते है। साथ ही जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। इसदिन गन्ना, अनार केला सिंघाड़ा आदि ऋतु फल भगवान विष्णु को अर्पण करना चाहिए। विष्णु जी का चरणामृत पीने से पुनर्जन्म नहीं होता। पूजन के समय ताम्र पात्र में शालिग्राम का गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। उसमें तुलसीदल, केशर, चंदन आदि का भी मिश्रण होता है।

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