पूर्वजो को भूल रही वर्तमान पीढ़ी
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। आज भादो पूर्णिमा है। कल से अश्विन क्वार मास का कृष्ण पक्ष शुरू हो रहा है। कल से ही शुरू होगा पितरो के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने का पखवारा पितृपक्ष। जिसके श्राद्ध कर्म से पितरो के प्रति श्रद्धा व सम्मान से उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया जाता है। पूर्वजो को पितृलोक से देवलोक पहुंचाने की यह सनातन परम्परा यद्यपि अभी ग्रामीण इलाको जीवित है तथा इसके अनुष्ठान भी कराए जाते है। वही अन्य परम्पराओं के बदलाव की तर्ज पर पितृपक्ष एवं श्राद्ध अनुष्ठान पर भी पाश्चात्य सभ्यता का रंग चढ़ने लगा है। शहरी के साथ ही ग्रामीण इलाको के पढ़ लिखे युवको की नजर से श्राद्ध अनुष्ठान अब महज रूढ़िवादी परम्परा बनकर रह गई है। गौरतलब है कि अश्विन मास के शुरूआत में सूर्य दक्षिणायन की ओर उन्मुख होता है। यही दिशा पितरा की मानी जाती है। इसके फलस्वरूप भादो माह की पूर्णिमा तिथि को ही अनुष्ठान कर्ता क्षैतरिक कर्म से निवृत्त होकर स्नान करके एकाग्र चित्त मन से अपने पितरो का आहवान करता है। अनुष्ठान कर्ता का यह विधान तर्पण कहलाता है। जो पखवारे भर पितृ विसर्जन तक चलता है। शास्त्रो के अनुसार प्रत्येक तर्पणकर्ता को अपने गोत्र का उल्लेख मंत्रो के मध्य अवश्य करना चाहिए। ऐसा न करने से दिया गया जल पितरो को नहीं मिलता। ऐसी मान्यता है कि इस क्रिया के दौरान सामग्री में पैती, कुशा, मोढ़ा, ढाक के पत्ते के साथ काला तिल का प्रयोग किया जाना चाहिए। अनुष्ठान की समाप्ति के दिन सारी सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। समाप्ति के ही दिन ब्राम्हणो को भोजन, दान दक्षिणा के साथ इस भाव से विदा किया जाता है कि हे पितरो आप मेरे सपरिवार को सुख, शांति प्रदान करते हुए सदैव रक्षा करते रहे। इसी दिन पुरोहितो को बुलाकर पिण्डदान की क्रिया भी कराई जाती है। इस अनुष्ठान के माध्यम से पितरो को पितृलोक से देवलोक का वासी बनाने का उपक्रम किया जाता है। इसमें गाय के दूध में सावा का चावल या जौ का आटा मिलाकर पकाने के उपरान्त एक गोल पिण्ड बनाया जाता है जो ब्राम्हण का प्रतीक होता है तथ छह अन्य पिण्डो में तीन पितृपक्ष एवं तीन मातृपक्ष के रूप मे माने जाते है। इन्हे क्रमशः अलग अलग रखकर विधिवत पूजन किया जाता है। पूजन के उपरान्त इन्हे आपस में मिला दिया जाता है। अनुष्ठान कर्ता चाहे तो इसमंे सपरिवार शामिल हो सकता है। पितृपक्ष में मातृनवमी पर परिवार के दिवंगत महिलाओ की विदाई का होता है। जिसे गांव की भाषा में बुढ़िया की विदाई का नाम दिया जाता है। इस तिथि को ब्राहम्ण को आमंत्रित करके भोजन दान आदि से संतुष्ट करने की मान्यता है। वही समय के बदलाव के साथ साथ नई पीढ़ी इसे बकवास मानकर इससे पीछा छुड़ाने की जुगत बनाने में दिलचस्पी दिखाती है।
पूर्वजो को भूल रही वर्तमान पीढ़ी
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। आज भादो पूर्णिमा है। कल से अश्विन क्वार मास का कृष्ण पक्ष शुरू हो रहा है। कल से ही शुरू होगा पितरो के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने का पखवारा पितृपक्ष। जिसके श्राद्ध कर्म से पितरो के प्रति श्रद्धा व सम्मान से उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया जाता है। पूर्वजो को पितृलोक से देवलोक पहुंचाने की यह सनातन परम्परा यद्यपि अभी ग्रामीण इलाको जीवित है तथा इसके अनुष्ठान भी कराए जाते है। वही अन्य परम्पराओं के बदलाव की तर्ज पर पितृपक्ष एवं श्राद्ध अनुष्ठान पर भी पाश्चात्य सभ्यता का रंग चढ़ने लगा है। शहरी के साथ ही ग्रामीण इलाको के पढ़ लिखे युवको की नजर से श्राद्ध अनुष्ठान अब महज रूढ़िवादी परम्परा बनकर रह गई है। गौरतलब है कि अश्विन मास के शुरूआत में सूर्य दक्षिणायन की ओर उन्मुख होता है। यही दिशा पितरा की मानी जाती है। इसके फलस्वरूप भादो माह की पूर्णिमा तिथि को ही अनुष्ठान कर्ता क्षैतरिक कर्म से निवृत्त होकर स्नान करके एकाग्र चित्त मन से अपने पितरो का आहवान करता है। अनुष्ठान कर्ता का यह विधान तर्पण कहलाता है। जो पखवारे भर पितृ विसर्जन तक चलता है। शास्त्रो के अनुसार प्रत्येक तर्पणकर्ता को अपने गोत्र का उल्लेख मंत्रो के मध्य अवश्य करना चाहिए। ऐसा न करने से दिया गया जल पितरो को नहीं मिलता। ऐसी मान्यता है कि इस क्रिया के दौरान सामग्री में पैती, कुशा, मोढ़ा, ढाक के पत्ते के साथ काला तिल का प्रयोग किया जाना चाहिए। अनुष्ठान की समाप्ति के दिन सारी सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। समाप्ति के ही दिन ब्राम्हणो को भोजन, दान दक्षिणा के साथ इस भाव से विदा किया जाता है कि हे पितरो आप मेरे सपरिवार को सुख, शांति प्रदान करते हुए सदैव रक्षा करते रहे। इसी दिन पुरोहितो को बुलाकर पिण्डदान की क्रिया भी कराई जाती है। इस अनुष्ठान के माध्यम से पितरो को पितृलोक से देवलोक का वासी बनाने का उपक्रम किया जाता है। इसमें गाय के दूध में सावा का चावल या जौ का आटा मिलाकर पकाने के उपरान्त एक गोल पिण्ड बनाया जाता है जो ब्राम्हण का प्रतीक होता है तथ छह अन्य पिण्डो में तीन पितृपक्ष एवं तीन मातृपक्ष के रूप मे माने जाते है। इन्हे क्रमशः अलग अलग रखकर विधिवत पूजन किया जाता है। पूजन के उपरान्त इन्हे आपस में मिला दिया जाता है। अनुष्ठान कर्ता चाहे तो इसमंे सपरिवार शामिल हो सकता है। पितृपक्ष में मातृनवमी पर परिवार के दिवंगत महिलाओ की विदाई का होता है। जिसे गांव की भाषा में बुढ़िया की विदाई का नाम दिया जाता है। इस तिथि को ब्राहम्ण को आमंत्रित करके भोजन दान आदि से संतुष्ट करने की मान्यता है। वही समय के बदलाव के साथ साथ नई पीढ़ी इसे बकवास मानकर इससे पीछा छुड़ाने की जुगत बनाने में दिलचस्पी दिखाती है।



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