कल होगा नागदेवता का पूजन
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। रिमझिम फुहारो एवं हरियाली के साथ आने वाला नागपंचमी का पर्व अब परम्पराओ से दूर हो गया है। दंगल व कजरी गायन तो जैसे बीते दिनो की बात हो गई है। इस साल तो नागपंचमी की खुशियो पर महंगाई कुण्डली मारकर बैठ गई है। ऐसे में लोगो मे त्योहार के प्रति विशेष उत्साह नहीं दिख रहा है। सुहागिनो के विशेष श्रृंगार एवं पिया से दूर रहने पर वियोग को दर्शाने वाला यह त्योहार भी आधुनिकता से अछूता नहीं है। इस साल यह त्योहार 13 अगस्त को पड़ रहा है। गांव के तालाब के किनारे कुरीतियो की प्रतिक गुड़िया को पीटने का वह नजारा अब आंखो से जैसे ओझल होता जा रहा हैं इसकी एक वजह यह भी है कि अवैध कब्जो के चलते अब तालाब समाप्त होते जा रहे है। शहरो में तो यह परम्परा विलुप्त सी हो गई है। अगर बचा है तो सिर्फ पकवान बनाकर त्योहार पर खाना। थोड़ी बहुत परम्परा का निर्वहन ग्रामीण अंचल में फिर भी हो रहा है। वहां खासकर नीम के पुराने पेड़ो में मोटे रस्से के द्वारा पटोहा डाला गया हैं उस पर एक साथ पांच छह लोग झूलते नजर आते है। उनके द्वारा कजरी का गायन भी होता है परन्तु उसमें भी फिल्मी तर्ज सुनाई पड़ती है। दूसरी तरफ त्योहार पर महंगाई का भी असर है। कोरोना महामारी के कारण तमाम लोग आर्थिक परेशानी झेल रहे है। उनकी जेब अभी खाली है। उन्हे गुझिया के लिए महंगा खोआ, रिफाइन्ड आदि खरीदना भारी पड़ रहा है। महंगाई की मार बहू बेटियो को भी झेलना पड़ रहा है। बच्चो का मन बहलाने के लिए लोग त्योहार मनाने की तैयारी कर रहे है। बहू बेटी मायके में झूले का आनन्द ले रही है। शहरी क्षेत्रो में जहां पेड़ो पर झूले डालने की जगह नहीं है। वहां बच्चो के लिए छत के चुल्लो में ही झूले बनाए गए इससे करीब डेढ़ साल स्कूलो के बंद होने से परेशान बच्चे अपना समय व्यतीत कर रहे है।
कल होगा नागदेवता का पूजन
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। रिमझिम फुहारो एवं हरियाली के साथ आने वाला नागपंचमी का पर्व अब परम्पराओ से दूर हो गया है। दंगल व कजरी गायन तो जैसे बीते दिनो की बात हो गई है। इस साल तो नागपंचमी की खुशियो पर महंगाई कुण्डली मारकर बैठ गई है। ऐसे में लोगो मे त्योहार के प्रति विशेष उत्साह नहीं दिख रहा है। सुहागिनो के विशेष श्रृंगार एवं पिया से दूर रहने पर वियोग को दर्शाने वाला यह त्योहार भी आधुनिकता से अछूता नहीं है। इस साल यह त्योहार 13 अगस्त को पड़ रहा है। गांव के तालाब के किनारे कुरीतियो की प्रतिक गुड़िया को पीटने का वह नजारा अब आंखो से जैसे ओझल होता जा रहा हैं इसकी एक वजह यह भी है कि अवैध कब्जो के चलते अब तालाब समाप्त होते जा रहे है। शहरो में तो यह परम्परा विलुप्त सी हो गई है। अगर बचा है तो सिर्फ पकवान बनाकर त्योहार पर खाना। थोड़ी बहुत परम्परा का निर्वहन ग्रामीण अंचल में फिर भी हो रहा है। वहां खासकर नीम के पुराने पेड़ो में मोटे रस्से के द्वारा पटोहा डाला गया हैं उस पर एक साथ पांच छह लोग झूलते नजर आते है। उनके द्वारा कजरी का गायन भी होता है परन्तु उसमें भी फिल्मी तर्ज सुनाई पड़ती है। दूसरी तरफ त्योहार पर महंगाई का भी असर है। कोरोना महामारी के कारण तमाम लोग आर्थिक परेशानी झेल रहे है। उनकी जेब अभी खाली है। उन्हे गुझिया के लिए महंगा खोआ, रिफाइन्ड आदि खरीदना भारी पड़ रहा है। महंगाई की मार बहू बेटियो को भी झेलना पड़ रहा है। बच्चो का मन बहलाने के लिए लोग त्योहार मनाने की तैयारी कर रहे है। बहू बेटी मायके में झूले का आनन्द ले रही है। शहरी क्षेत्रो में जहां पेड़ो पर झूले डालने की जगह नहीं है। वहां बच्चो के लिए छत के चुल्लो में ही झूले बनाए गए इससे करीब डेढ़ साल स्कूलो के बंद होने से परेशान बच्चे अपना समय व्यतीत कर रहे है।



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