प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी. दूर स्थित बाबा बेलखरनाथ धाम की पौराणिकता के बारे में तरह तरह की चर्चाएं प्रचलित है। यहां भगवान शिव के मंदिर के अलावा राम जानकी, पार्वती व हनुमान जी के मंदिर बने है। साथ ही शिवभक्तो की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। बताया जाता है कि वन जाते समय भगवान राम ने यहां पर शिवलिंग की स्थापना की थी। उस समय इस क्षेत्र में बेल नृपति का आधिपत्य था। इसी कारण इसे बेल्वेश्वर नाथ भी कहा जाता है। इस बात का उल्लेख वर्ष 1916 में बस्त गोत्र चैहान वंश की दोहावली में कवि गोपाल ने किया है। कहा जाता है कि दिलीपपुर रियासत के क्षेत्र में आने वाले इस स्थन पर पहले जंगल था। एक दिन कोई लकड़हारा उधर से लकड़ी काटने जा रहा था। उसने अपनी कुल्हाड़ी में धार लगाने के लिए पत्थर की शक्ल में रहे एक टुकड़े पर कुल्हाड़ी रगड़ने का प्रयास किया। इसके बाद उसकी तबियत बिगड़ने लगी तथा अचेत हो गया। होश में आने पर वह घर पहुंचा। उसने स्वप्न में देखा कि जिस पत्थर पर वह कुल्हाड़ी में धार लगाने का प्रयास कर रहा था वह पत्थर नहीं बल्कि शिवलिंग है। यह बात लकड़हारे ने जाकर राजा साहब को बताया। लकड़हारे की बात सुनने के बाद राजा ने वहां का जंगल साफ कराया। साथ ही मंदिर बनवाने का प्रयास किया। परन्तु वह मंदिर बनवा नहीं सके। दिन के समय जितना मंदिर बनता, रात में उतना गिर जाता। अंत में राजा ने मंदिर का निर्माण बंद करवा दिया। इसके बााद इसी गांव के शिव हर्ष ओझा यहां रहने लगे। साथ ही शिवलिंग की पूजा अर्चना करने लगे। वर्ष 1915 में अचलासप्तमी के दिन शिवहर्ष ने अपनी मां सिरताजी के हाथ में पांच ईट रखवाकर मंदिर का नीव पूजन करवाया। मंदिर निर्माण का कार्य वर्ष 1946 में उनके पुत्र श्यामानन्द ने पूरा कराया। आज भी इस मंदिर की देखरेख में उन्ही के वंशज करते है।
प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी. दूर स्थित बाबा बेलखरनाथ धाम की पौराणिकता के बारे में तरह तरह की चर्चाएं प्रचलित है। यहां भगवान शिव के मंदिर के अलावा राम जानकी, पार्वती व हनुमान जी के मंदिर बने है। साथ ही शिवभक्तो की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। बताया जाता है कि वन जाते समय भगवान राम ने यहां पर शिवलिंग की स्थापना की थी। उस समय इस क्षेत्र में बेल नृपति का आधिपत्य था। इसी कारण इसे बेल्वेश्वर नाथ भी कहा जाता है। इस बात का उल्लेख वर्ष 1916 में बस्त गोत्र चैहान वंश की दोहावली में कवि गोपाल ने किया है। कहा जाता है कि दिलीपपुर रियासत के क्षेत्र में आने वाले इस स्थन पर पहले जंगल था। एक दिन कोई लकड़हारा उधर से लकड़ी काटने जा रहा था। उसने अपनी कुल्हाड़ी में धार लगाने के लिए पत्थर की शक्ल में रहे एक टुकड़े पर कुल्हाड़ी रगड़ने का प्रयास किया। इसके बाद उसकी तबियत बिगड़ने लगी तथा अचेत हो गया। होश में आने पर वह घर पहुंचा। उसने स्वप्न में देखा कि जिस पत्थर पर वह कुल्हाड़ी में धार लगाने का प्रयास कर रहा था वह पत्थर नहीं बल्कि शिवलिंग है। यह बात लकड़हारे ने जाकर राजा साहब को बताया। लकड़हारे की बात सुनने के बाद राजा ने वहां का जंगल साफ कराया। साथ ही मंदिर बनवाने का प्रयास किया। परन्तु वह मंदिर बनवा नहीं सके। दिन के समय जितना मंदिर बनता, रात में उतना गिर जाता। अंत में राजा ने मंदिर का निर्माण बंद करवा दिया। इसके बााद इसी गांव के शिव हर्ष ओझा यहां रहने लगे। साथ ही शिवलिंग की पूजा अर्चना करने लगे। वर्ष 1915 में अचलासप्तमी के दिन शिवहर्ष ने अपनी मां सिरताजी के हाथ में पांच ईट रखवाकर मंदिर का नीव पूजन करवाया। मंदिर निर्माण का कार्य वर्ष 1946 में उनके पुत्र श्यामानन्द ने पूरा कराया। आज भी इस मंदिर की देखरेख में उन्ही के वंशज करते है।



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