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12 वां विश्व हिंदी सम्मेलन फिजी के नादी में आयोजित हुआ

लोकमित्र ब्यूरो
झूंसी (प्रयागराज)।
12 वां विश्व हिंदी सम्मेलन फिजी के नादी में आयोजित हुआ। जिसका शुभारंभ फिजी के राष्ट्रपति रातू विलीमे काटोनिवेरे और भारत के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम् जयशंकर ने संयुक्त रूप से किया। भारत का प्रतिनिधिमंडल गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्र एवं विदेश राज्य मंत्री वी0 मुरलीधरन के नेतृत्व में विशेष विमान से फिजी पहुंचा। इस विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत के अलावा संसार के लगभग 20 देशों के हिंदी प्रतिनिधि शामिल हुए। कुल 15 सत्रों में 15 से 17 फरवरी तक कार्यक्रम संपन्न हुए। जिसमें 10 विषयों पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियां आयोजित की गई। जिसमें वर्तमान परिदृश्य में प्रवासी हिंदी साहित्य पर डॉ0 विजयानंद को अतिथि के रूप में बोलने का अवसर मिला। उन्होने बताया कि मैंने भारतीय स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी न बन पाने एवं मारीशस, फिजी में हिंदी को अनिवार्य रूप से पढ़ाएं न जाने के कारण प्रवासी भारतीयों के मन के दुख को स्पष्ट किया और बाल साहित्य और बाल मनोविज्ञान के माध्यम से नई पीढ़ी के लिए भारतीय एवं प्रवासी साहित्यकारों द्वारा बाल साहित्य सृजन, पाठ्यक्रमों में शामिल कर नई पीढ़ी को हिंदी के प्रति जागरूक करने तथा प्रवासी भारतीयों के प्रोत्साहन हेतु कुछ और पुरस्कारों, सम्मानों को बढ़ाने की बात कही। फिजी आकर ऐसा लगा जैसे एक अलग से लघु भारत प्रशांत महासागर के किनारे बसा हुआ है। जिसमें मात्रृभाषा के रूप में फिजी, हिंदी और अंग्रेजी का वर्चस्व है। उत्तर प्रदेश, बिहार तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों से आए, गिरमिटिया मजदूरों के वंशज आज भी अपनी भोजपुरी हिंदी बोलते हैं, लगता ही नहीं वे भारतीय नहीं हैं। भले उनकी कई पीढ़ियां सैकड़ों बर्षों पूर्व भारत से आई हों। वे जानते हैं कि उनके पूर्वज किस प्रदेश के किस शहर से आए हैं, किंतु वह भारत आने की इच्छा तो अवश्य रखते हैं, लेकिन लंबी दूरी के कारण नहीं आ पाते। तकनीकी दृष्टि से पूरी तरह विकसित फिजी का नगरीय क्षेत्र अपनी मातृभाषा को भरपूर सम्मान देता है। मात्रृभाषा अर्थात वह भाषा जो मां के द्वारा बचपन से अपने बच्चों को सिखाई गई हो। यहां के लोगों में तो मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति अंतर्मन से अनुराग है। भारत की ही तरह संविधान में उल्लेखित करके हिन्दी को छोड़ दिया गया है । हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाया जाना चाहिए।

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लोकमित्र ब्यूरो
झूंसी (प्रयागराज)।
12 वां विश्व हिंदी सम्मेलन फिजी के नादी में आयोजित हुआ। जिसका शुभारंभ फिजी के राष्ट्रपति रातू विलीमे काटोनिवेरे और भारत के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम् जयशंकर ने संयुक्त रूप से किया। भारत का प्रतिनिधिमंडल गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्र एवं विदेश राज्य मंत्री वी0 मुरलीधरन के नेतृत्व में विशेष विमान से फिजी पहुंचा। इस विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत के अलावा संसार के लगभग 20 देशों के हिंदी प्रतिनिधि शामिल हुए। कुल 15 सत्रों में 15 से 17 फरवरी तक कार्यक्रम संपन्न हुए। जिसमें 10 विषयों पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियां आयोजित की गई। जिसमें वर्तमान परिदृश्य में प्रवासी हिंदी साहित्य पर डॉ0 विजयानंद को अतिथि के रूप में बोलने का अवसर मिला। उन्होने बताया कि मैंने भारतीय स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी न बन पाने एवं मारीशस, फिजी में हिंदी को अनिवार्य रूप से पढ़ाएं न जाने के कारण प्रवासी भारतीयों के मन के दुख को स्पष्ट किया और बाल साहित्य और बाल मनोविज्ञान के माध्यम से नई पीढ़ी के लिए भारतीय एवं प्रवासी साहित्यकारों द्वारा बाल साहित्य सृजन, पाठ्यक्रमों में शामिल कर नई पीढ़ी को हिंदी के प्रति जागरूक करने तथा प्रवासी भारतीयों के प्रोत्साहन हेतु कुछ और पुरस्कारों, सम्मानों को बढ़ाने की बात कही। फिजी आकर ऐसा लगा जैसे एक अलग से लघु भारत प्रशांत महासागर के किनारे बसा हुआ है। जिसमें मात्रृभाषा के रूप में फिजी, हिंदी और अंग्रेजी का वर्चस्व है। उत्तर प्रदेश, बिहार तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों से आए, गिरमिटिया मजदूरों के वंशज आज भी अपनी भोजपुरी हिंदी बोलते हैं, लगता ही नहीं वे भारतीय नहीं हैं। भले उनकी कई पीढ़ियां सैकड़ों बर्षों पूर्व भारत से आई हों। वे जानते हैं कि उनके पूर्वज किस प्रदेश के किस शहर से आए हैं, किंतु वह भारत आने की इच्छा तो अवश्य रखते हैं, लेकिन लंबी दूरी के कारण नहीं आ पाते। तकनीकी दृष्टि से पूरी तरह विकसित फिजी का नगरीय क्षेत्र अपनी मातृभाषा को भरपूर सम्मान देता है। मात्रृभाषा अर्थात वह भाषा जो मां के द्वारा बचपन से अपने बच्चों को सिखाई गई हो। यहां के लोगों में तो मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति अंतर्मन से अनुराग है। भारत की ही तरह संविधान में उल्लेखित करके हिन्दी को छोड़ दिया गया है । हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाया जाना चाहिए।

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