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लालगोपालगंज के मुस्लिम बनाते हैं देवी की चुनरी और कलावा

कस्बे में बना सामान वैष्णो माता, मैहर, विंध्याचल, अयोध्या समेत देश के कई धार्मिक स्थलों पर है जाता

राज्य ब्यूरो प्रमुख। नवरात्र के पर देवी मां को कलावा और चुनरी चढ़ाने का विशेष मपर श्रद्धालु देवी मां को कलावा धागा और चुनरी चढ़ाने की इच्छा रखते हैं। हिन्दुओं की आस्था से जुड़े ये सामान उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अंतर्गत लाल गोपालगंज कस्बे में रहने वाले दर्जनों मुस्लिम परिवार उसी तन्मयता से तैयार करते हैं जैसे गुजरात के गोधरा में रहने वाले मुसलमान नवरात्र का व्रत रखहत्व है। बात चाहे जम्मू स्थित मां वैष्णो देवी का मंदिर हो या फिर विंध्याचल धाम स्थित माँ विंध्यवासिनी देवी की। इन सभी धार्मिक जगहों ते हैं। प्रयागराज से लगभग 60 किलोमीटर दूर लखनऊ मार्ग पर स्थित लालगोपालगंज कस्बा कौमी एकता और भाईचारे के लिए जाना जाता है। यहां आसपास सैकड़ों मुस्लिम परिवार हैं जिनके रोजी-रोटी का साधन हिन्दुओं की पूजा सामग्री में उपयोग होने वाली चुनरी और कलावा-धागा है। खास बात यह है कि इन परिवारों को ये काम करने में जरा-सा भी गुरेज नहीं है। मुस्लिमों के हाथ का बना समान भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों में चढ़ाया जाता है। काम करने वाले मुस्लिम परिवार प्रयुक्त होने वाला कच्चा सामान मुम्बई और भिवंडी से लाते हैं। बाकी सारा काम रंगाई से लेकर डिजाइन तैयार करने का काम यहीं पर होता है। बनने के बाद ये सामान वैष्णो देवी, मैहर, विंध्याचल, अयोध्या, चित्रकूट के अलावा देश के कई धार्मिक स्थलों पर जाता है। नवरात्र में आस्था और विश्वास की उम्मीदें समेटे हुए जब कोई माता के मंदिर में श्रद्धा लेकर आता है तो उसकी पूजा की थाली में रखी चुनरी और कलावा उसकी आस्था का प्रतीक होती है लेकिन माता को चढ़ाने वाली इस चुनरी पर किन हाथों ने रंग चढ़ाया है, कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। लालगोपालगंज कस्बे के सैकड़ों मुस्लिम परिवार अपने पुश्तैनी रंगाई के काम को सांप्रदायिक सद्भावना के रंग में रंगने का काम कर रहे है। जिसको कई पीढ़ियों से करते चले आ रहे हैं। कुछ सालों से दो समुदायों के बीच नफरत की गहरी होती खाई को अपने सौहार्दपूर्ण कामों से पाटने के काम में जुटे हैं।इमामगंज, उमरावगंज, आधार गंज, रावा, अलहाद गंज, खान जहान पुर में मुस्लिम धर्म के सब्बाग बिरादरी के लोग मंदिरों में चढ़ाने वाली चुनरी, नारियल चुनरी, रामनामी और कलावा आदि बनाते हैं। इसे शहर ही नहीं देश के अन्य प्रदेशों में भी भेजा जाता है।

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कस्बे में बना सामान वैष्णो माता, मैहर, विंध्याचल, अयोध्या समेत देश के कई धार्मिक स्थलों पर है जाता

राज्य ब्यूरो प्रमुख। नवरात्र के पर देवी मां को कलावा और चुनरी चढ़ाने का विशेष मपर श्रद्धालु देवी मां को कलावा धागा और चुनरी चढ़ाने की इच्छा रखते हैं। हिन्दुओं की आस्था से जुड़े ये सामान उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अंतर्गत लाल गोपालगंज कस्बे में रहने वाले दर्जनों मुस्लिम परिवार उसी तन्मयता से तैयार करते हैं जैसे गुजरात के गोधरा में रहने वाले मुसलमान नवरात्र का व्रत रखहत्व है। बात चाहे जम्मू स्थित मां वैष्णो देवी का मंदिर हो या फिर विंध्याचल धाम स्थित माँ विंध्यवासिनी देवी की। इन सभी धार्मिक जगहों ते हैं। प्रयागराज से लगभग 60 किलोमीटर दूर लखनऊ मार्ग पर स्थित लालगोपालगंज कस्बा कौमी एकता और भाईचारे के लिए जाना जाता है। यहां आसपास सैकड़ों मुस्लिम परिवार हैं जिनके रोजी-रोटी का साधन हिन्दुओं की पूजा सामग्री में उपयोग होने वाली चुनरी और कलावा-धागा है। खास बात यह है कि इन परिवारों को ये काम करने में जरा-सा भी गुरेज नहीं है। मुस्लिमों के हाथ का बना समान भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों में चढ़ाया जाता है। काम करने वाले मुस्लिम परिवार प्रयुक्त होने वाला कच्चा सामान मुम्बई और भिवंडी से लाते हैं। बाकी सारा काम रंगाई से लेकर डिजाइन तैयार करने का काम यहीं पर होता है। बनने के बाद ये सामान वैष्णो देवी, मैहर, विंध्याचल, अयोध्या, चित्रकूट के अलावा देश के कई धार्मिक स्थलों पर जाता है। नवरात्र में आस्था और विश्वास की उम्मीदें समेटे हुए जब कोई माता के मंदिर में श्रद्धा लेकर आता है तो उसकी पूजा की थाली में रखी चुनरी और कलावा उसकी आस्था का प्रतीक होती है लेकिन माता को चढ़ाने वाली इस चुनरी पर किन हाथों ने रंग चढ़ाया है, कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। लालगोपालगंज कस्बे के सैकड़ों मुस्लिम परिवार अपने पुश्तैनी रंगाई के काम को सांप्रदायिक सद्भावना के रंग में रंगने का काम कर रहे है। जिसको कई पीढ़ियों से करते चले आ रहे हैं। कुछ सालों से दो समुदायों के बीच नफरत की गहरी होती खाई को अपने सौहार्दपूर्ण कामों से पाटने के काम में जुटे हैं।इमामगंज, उमरावगंज, आधार गंज, रावा, अलहाद गंज, खान जहान पुर में मुस्लिम धर्म के सब्बाग बिरादरी के लोग मंदिरों में चढ़ाने वाली चुनरी, नारियल चुनरी, रामनामी और कलावा आदि बनाते हैं। इसे शहर ही नहीं देश के अन्य प्रदेशों में भी भेजा जाता है।

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