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गांधीवादी बाबा रामचंद्र शर्मा

38 घण्टे के घेराव के बाद पहली बार  सत्ता को अपने कदम वापस लेने के लिए किसानों ने किया मजबूर
काशी विद्यापीठ मंच पर गांधीजी की मौजूदगी में ही अवध किसान सभा के अगुआ बाबा रामचंद्र की  गिरफ्तारी हुई
लगभग 60 हजार किसानों की भीड़ ने कचेहरी से जिला जेल तक कर लिया अनवरत घेराव
    प्रतापगढ़ (अवध)। अंग्रेज अधिकारी को भरी सभा में फूफा कह देने के आरोप में 10 फरवरी,1921 को  वाराणसी के काशी विद्यापीठ ( विश्वविद्यालय ) स्थापना दिवस के मौके पर जब बाबा रामचंद्र को गिरफ्तार किया गया तो पूरे संयुक्त प्रांत में हलचल सी मच गई ! अवध किसान सभा के अगुआ और जनपद प्रतापगढ़ के कर्मवीर बाबा रामचंद्र को गिरफ्तार करने की कार्यवाही महात्मा गांधी की मौजूदगी में बनारस में हुई थी और बाबा के समर्थन में आमजन की हड़ताल बाराबंकी से शुरू हुई थी ! गांधीजी का कथन था कि स्वतंत्रता प्राप्ति केवल जेल जाने से ही मिलेगी! यहाँ गांधी जी का रवैया ढुलमुल बना रहा उन्होंने गिरफ्तारी का विरोध भी नहीं किया! स्वतंत्रता सेनानी  पुरुषोत्तम दास टण्डन एवं पं०जवाहर लाल नेहरू ने बाबा की गिरफ्तारी के बाद अशांत बाराबंकी जाकर वहाँ की जनता को सान्त्वना दी! संयुक्त प्रान्त किसान सभा ने तत्कालीन अध्यक्ष मोती लाल नेहरू और उपाध्यक्ष गौरीशंकर मिश्र के हस्ताक्षर युक्त एक पर्चा बंटा था और जिसकी भाषा थी ” शान्ति, धैर्य, असहयोग और बाबा रामचंद्र की आज़ादी!” दूसरी बार अप्रैल 1921 के अंत में मोतीलाल नेहरू ने किसानों को संदेश नामक पर्चा बटवाया ! इस पर्चे को प्रतापगढ़ के ही नवयुवकों (17-21 वर्ष) वंश नारायण सिंह, राधारमण ,ज्वाला प्रसाद , राम हरक सिंह , मुरलीधर और मंगल प्रसाद ने बेल्हा शहर में पर्चा बांटा था! वे सभी तब गवर्नमेंट स्कूल के छात्र थे बाद में सभी छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें सजा हुई किंतु पर्चे के लेखकों के खिलाफ एक भी टिप्पणी कहीं से भी नहीं आई! स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों की बात करें तो किसान आंदोलन में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब 28 अगस्त 1920 को प्रतापगढ़ के पट्टी क्षेत्र की लखरावां बाग में सभा कर रहे बाबा रामचंद्र व झींगुरी सिंह सहित 32 लोगों को ताल्लुकेदारों ने लकड़ी चोरी के फर्जी मामले में गिरफ्तार करवा कर जेल भिजवा दिया। 1 सितम्बर,1920 को जनपद मुख्यालय की सदर कचेहरी में मामले की सुनवाई होनी थी सुबह आलम यह हुआ कि 4000 से 5000 किसानों की भीड़ शहर में जमा हुई और अपने दोनों मुख्य नेताओं को देखने सदर कचहरी में जमावड़ा इकट्ठा हो गया!  किसान आक्रोशित थे और उनकी भीड़ बढ़ती ही जा रही थी, घबराकर कार्यवाहक डिप्टी कमिश्नर बृजलाल ने तय किया कि अभियुक्तों को जेल से बाहर नहीं लाया जाएगा और जेल में ही मुकदमे की सुनवाई होगी ! यह बात सुनकर किसानों की भीड़ ने 5:00 बजे शाम को जिला जेल के बाहर अपना डेरा जमा दिया और मांग करने लगे कि बाबा रामचंद्र सहित हमारे नेताओं को दिखाओ अन्यथा हमें भी जेल में डाल दो  !      महात्मा गांधी को नेताओं ने तुरन्त प्रतापगढ पहुंचने का टेलीग्राम कर दिया! अवध किसान सभा के सचिव एवं प्रसिद्ध अधिवक्ता माताबदल पांडेय व परमेश्वरी लाल ने अदालत में इन किसान नेताओं की पैरवी की थी। 10 सितम्बर, 1920 को बेचैन किसानों की बीस हजार से अधिक की तादाद में भारी भीड़  का हुजूम उमड़ पडा था!पुलिस ने मोर्चा संभाल लिया मगर भारी भीड को देखते हुए गोली चलाने के बजाय संगीनों से भीड़ को हटाने का प्रयास किया जाने लगा! शाम तक वकील माता बदल पाण्डेय द्वारा अगले दिन 11/9 को छोडने की घोषणा की!किसान अब भी अपने घरों को नहीं लौटे बल्कि सई नदी के किनारे बेल्हा घाट पर टिकान डाल दिया!जेल के अन्दर ही लगी अदालत में दिन की सुनवाई निर्णायक साबित हुई! किसानों की भीड़ को देखकर अधिकारियों ने बाबा रामचंद्र को जेल से छोडने का मन बना लिया था! 11 सितम्बर, 1920 को कार में बैठाकर बाबा को पास के ही एक गन्ने के खेत में ले जाकर छोड़ दिया गया! रामलीला मैदान के सुगाही बाग के सेना शिविर मैदान में बाबा को देखने के लिए 60 हजार लोगों से अधिक भीड़ तब तक इकट्ठा हो चुकी थी!   इस प्रकार पहली बार औपनिवेशिक सत्ता को किसानों ने अपने कदम पीछे की ओर खींच लेने पडे! साथ ही किसानों की भारी भीड़ ने लगातार 38 घण्टे का घेराव करके प्रशासन से परिणाम हासिल करके ही माने! इस घटना को किसान आंदोलन का स्वर्णिम अध्याय कहा गया है, जब हजारों किसानों ने घेरा डाल कर प्रतापगढ़ के प्रशासन को इन नेताओं को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। हालांकि इसके पहले इनकी जमानतें भी खारिज कर दी गयी थीं। इसी घटनाक्रम ने बाबा रामचंद्र को किसान नेता के रूप में स्थापित कर दिया। ” जय हिंद “

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38 घण्टे के घेराव के बाद पहली बार  सत्ता को अपने कदम वापस लेने के लिए किसानों ने किया मजबूर
काशी विद्यापीठ मंच पर गांधीजी की मौजूदगी में ही अवध किसान सभा के अगुआ बाबा रामचंद्र की  गिरफ्तारी हुई
लगभग 60 हजार किसानों की भीड़ ने कचेहरी से जिला जेल तक कर लिया अनवरत घेराव
    प्रतापगढ़ (अवध)। अंग्रेज अधिकारी को भरी सभा में फूफा कह देने के आरोप में 10 फरवरी,1921 को  वाराणसी के काशी विद्यापीठ ( विश्वविद्यालय ) स्थापना दिवस के मौके पर जब बाबा रामचंद्र को गिरफ्तार किया गया तो पूरे संयुक्त प्रांत में हलचल सी मच गई ! अवध किसान सभा के अगुआ और जनपद प्रतापगढ़ के कर्मवीर बाबा रामचंद्र को गिरफ्तार करने की कार्यवाही महात्मा गांधी की मौजूदगी में बनारस में हुई थी और बाबा के समर्थन में आमजन की हड़ताल बाराबंकी से शुरू हुई थी ! गांधीजी का कथन था कि स्वतंत्रता प्राप्ति केवल जेल जाने से ही मिलेगी! यहाँ गांधी जी का रवैया ढुलमुल बना रहा उन्होंने गिरफ्तारी का विरोध भी नहीं किया! स्वतंत्रता सेनानी  पुरुषोत्तम दास टण्डन एवं पं०जवाहर लाल नेहरू ने बाबा की गिरफ्तारी के बाद अशांत बाराबंकी जाकर वहाँ की जनता को सान्त्वना दी! संयुक्त प्रान्त किसान सभा ने तत्कालीन अध्यक्ष मोती लाल नेहरू और उपाध्यक्ष गौरीशंकर मिश्र के हस्ताक्षर युक्त एक पर्चा बंटा था और जिसकी भाषा थी ” शान्ति, धैर्य, असहयोग और बाबा रामचंद्र की आज़ादी!” दूसरी बार अप्रैल 1921 के अंत में मोतीलाल नेहरू ने किसानों को संदेश नामक पर्चा बटवाया ! इस पर्चे को प्रतापगढ़ के ही नवयुवकों (17-21 वर्ष) वंश नारायण सिंह, राधारमण ,ज्वाला प्रसाद , राम हरक सिंह , मुरलीधर और मंगल प्रसाद ने बेल्हा शहर में पर्चा बांटा था! वे सभी तब गवर्नमेंट स्कूल के छात्र थे बाद में सभी छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें सजा हुई किंतु पर्चे के लेखकों के खिलाफ एक भी टिप्पणी कहीं से भी नहीं आई! स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों की बात करें तो किसान आंदोलन में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब 28 अगस्त 1920 को प्रतापगढ़ के पट्टी क्षेत्र की लखरावां बाग में सभा कर रहे बाबा रामचंद्र व झींगुरी सिंह सहित 32 लोगों को ताल्लुकेदारों ने लकड़ी चोरी के फर्जी मामले में गिरफ्तार करवा कर जेल भिजवा दिया। 1 सितम्बर,1920 को जनपद मुख्यालय की सदर कचेहरी में मामले की सुनवाई होनी थी सुबह आलम यह हुआ कि 4000 से 5000 किसानों की भीड़ शहर में जमा हुई और अपने दोनों मुख्य नेताओं को देखने सदर कचहरी में जमावड़ा इकट्ठा हो गया!  किसान आक्रोशित थे और उनकी भीड़ बढ़ती ही जा रही थी, घबराकर कार्यवाहक डिप्टी कमिश्नर बृजलाल ने तय किया कि अभियुक्तों को जेल से बाहर नहीं लाया जाएगा और जेल में ही मुकदमे की सुनवाई होगी ! यह बात सुनकर किसानों की भीड़ ने 5:00 बजे शाम को जिला जेल के बाहर अपना डेरा जमा दिया और मांग करने लगे कि बाबा रामचंद्र सहित हमारे नेताओं को दिखाओ अन्यथा हमें भी जेल में डाल दो  !      महात्मा गांधी को नेताओं ने तुरन्त प्रतापगढ पहुंचने का टेलीग्राम कर दिया! अवध किसान सभा के सचिव एवं प्रसिद्ध अधिवक्ता माताबदल पांडेय व परमेश्वरी लाल ने अदालत में इन किसान नेताओं की पैरवी की थी। 10 सितम्बर, 1920 को बेचैन किसानों की बीस हजार से अधिक की तादाद में भारी भीड़  का हुजूम उमड़ पडा था!पुलिस ने मोर्चा संभाल लिया मगर भारी भीड को देखते हुए गोली चलाने के बजाय संगीनों से भीड़ को हटाने का प्रयास किया जाने लगा! शाम तक वकील माता बदल पाण्डेय द्वारा अगले दिन 11/9 को छोडने की घोषणा की!किसान अब भी अपने घरों को नहीं लौटे बल्कि सई नदी के किनारे बेल्हा घाट पर टिकान डाल दिया!जेल के अन्दर ही लगी अदालत में दिन की सुनवाई निर्णायक साबित हुई! किसानों की भीड़ को देखकर अधिकारियों ने बाबा रामचंद्र को जेल से छोडने का मन बना लिया था! 11 सितम्बर, 1920 को कार में बैठाकर बाबा को पास के ही एक गन्ने के खेत में ले जाकर छोड़ दिया गया! रामलीला मैदान के सुगाही बाग के सेना शिविर मैदान में बाबा को देखने के लिए 60 हजार लोगों से अधिक भीड़ तब तक इकट्ठा हो चुकी थी!   इस प्रकार पहली बार औपनिवेशिक सत्ता को किसानों ने अपने कदम पीछे की ओर खींच लेने पडे! साथ ही किसानों की भारी भीड़ ने लगातार 38 घण्टे का घेराव करके प्रशासन से परिणाम हासिल करके ही माने! इस घटना को किसान आंदोलन का स्वर्णिम अध्याय कहा गया है, जब हजारों किसानों ने घेरा डाल कर प्रतापगढ़ के प्रशासन को इन नेताओं को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। हालांकि इसके पहले इनकी जमानतें भी खारिज कर दी गयी थीं। इसी घटनाक्रम ने बाबा रामचंद्र को किसान नेता के रूप में स्थापित कर दिया। ” जय हिंद “

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