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माता-पिता की जो सेवा करते हैं भगवान खुद उनके द्वार आते हैं’

बाबूपट्टी में चल रही सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक ने बताया माता-पिता की सेवा का महत्व
दुर्गागंज (प्रतापगढ़) नि.सं.। बाबूपट्टी गांव में चल रही सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथाव्यास आचार्य संजीव कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने कहा कि जो लोग अपने माता-पिता की सेवा करते हैं उनको भगवान की पूजा करने की जरूरत नहीं होती, भगवान खुद दर्शन देने उनके द्वार पहुंचते हैं। श्रीरामचरितमानस के जटायु प्रसंग का उद्धरण देते हुए उन्होंने परोपकार का महत्व भी समझाया। पुण्डरीक की कथा के माध्यम से आचार्य ने बताया कि पुण्डरीक अपने माता की बहुत सेवा करते थे। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण को लगा आज चलकर पुण्डरीक को दर्शन देना चाहिए। द्वार पर पहुंचकर उन्होंने कुंडी खटखटाई। भीतर से पुण्डरीक ने जवाब दिया। कुछ समय लगेगा। अभी माताजी को स्नान करा रहा हूं। कुछ देर बाद भगवान ने फिर कुंडी खटखटाई। पुण्डरीक थोड़ा नाराज होते हुए बोले समझ में नहीं आता क्या? अभी मैं माताजी का वस्त्र बदल रहा हूं। कुछ समय और बीता तो भगवान ने फिर कुंडी खटखटाई। पुण्डरीक बोले, मां जी को भोजन करा रहा हूं। थोड़ा और इंतजार करना होगा। थोड़ी देर बाद जब पुण्डरीक ने दरवाजा खोला तो साक्षात भगवान श्रीकृष्ण जी को खड़े देख भौचक रह गए। बोले, भगवन क्षमा कीजियेगा। मैंने आपको बहुत भला बुरा कहा। आपके द्वार पर मुझे जाना चाहिए था। मगर वहां नहीं गया। आप जब खुद मेरे द्वार पर आए तो सत्कार करने की बजाय भला बुरा बोला। भगवान ने कहा, पुण्डरीक आपने कोई न गलती की, न कोई भूल और न ही कोई अपराध। आप अपना कर्म कर रहे थे। माता पिता की सेवा से बड़ी न कोई पूजा है और न हि कोई धर्म। जो लोग सच्चे मन से अपने माता-पिता की सेवा करते हैं उन्हें मेरे द्वार आने की जरूरत नहीं होती। मैं खुद उनके द्वार पहुंचता हूं। इसलिए लोगों को चाहिए कि माता-पिता की सच्चे मन से सेवा जरूर करें। इसी तरह श्री शुकदेव जी के जन्म का वर्णन करते हुए उन्होंने परोपकार के महत्व को विस्तार से समझाया। इस बारे में उन्होंने श्रीरामचरितमानस से जटायु प्रसंग का उदाहरण दिया। कहाकि जटायु एक पक्षी था। मगर सीता जी को रावण से बचाने के लिए उसने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इसीलिए भगवान श्रीराम ने उस पक्षी को बैकुण्ठ धाम प्रदान किया। भगवान ने कहा कि जटायु मांस भक्षण करने वाला, कभी न तो यज्ञ किया, न तप और न हि कभी भगवान का नाम ही लिया। इसके बावजूद परोपकार के कारण भगवान ने उसे मोक्ष प्रदान किया। इसीलिए कहा भी गया है कि-
   परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
     परपीड़ा सम नहिं अघमाई।
कथा के मुख्य यजमान गणों में श्रीमती शमला मिश्र और गया प्रसाद मिश्र, श्रीमती सीता मिश्रा और रवि प्रसाद मिश्र और श्रीमती आशा मिश्रा तथा केशव प्रसाद मिश्र शामिल हैं। व्यवस्था का दायित्व बार एसोसिएशन रानीगंज के पूर्व अध्यक्ष अशोक कुमार मिश्र (पप्पू मिश्र) संभाल रहे हैं। कथा का समय  प्रतिदिन अपराह्न 3 बजे से शाम 7 बजे तक निर्धारित है। 20 अप्रैल को जबकि 21 महाप्रसाद का कार्यक्रम है।

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बाबूपट्टी में चल रही सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक ने बताया माता-पिता की सेवा का महत्व
दुर्गागंज (प्रतापगढ़) नि.सं.। बाबूपट्टी गांव में चल रही सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथाव्यास आचार्य संजीव कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने कहा कि जो लोग अपने माता-पिता की सेवा करते हैं उनको भगवान की पूजा करने की जरूरत नहीं होती, भगवान खुद दर्शन देने उनके द्वार पहुंचते हैं। श्रीरामचरितमानस के जटायु प्रसंग का उद्धरण देते हुए उन्होंने परोपकार का महत्व भी समझाया। पुण्डरीक की कथा के माध्यम से आचार्य ने बताया कि पुण्डरीक अपने माता की बहुत सेवा करते थे। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण को लगा आज चलकर पुण्डरीक को दर्शन देना चाहिए। द्वार पर पहुंचकर उन्होंने कुंडी खटखटाई। भीतर से पुण्डरीक ने जवाब दिया। कुछ समय लगेगा। अभी माताजी को स्नान करा रहा हूं। कुछ देर बाद भगवान ने फिर कुंडी खटखटाई। पुण्डरीक थोड़ा नाराज होते हुए बोले समझ में नहीं आता क्या? अभी मैं माताजी का वस्त्र बदल रहा हूं। कुछ समय और बीता तो भगवान ने फिर कुंडी खटखटाई। पुण्डरीक बोले, मां जी को भोजन करा रहा हूं। थोड़ा और इंतजार करना होगा। थोड़ी देर बाद जब पुण्डरीक ने दरवाजा खोला तो साक्षात भगवान श्रीकृष्ण जी को खड़े देख भौचक रह गए। बोले, भगवन क्षमा कीजियेगा। मैंने आपको बहुत भला बुरा कहा। आपके द्वार पर मुझे जाना चाहिए था। मगर वहां नहीं गया। आप जब खुद मेरे द्वार पर आए तो सत्कार करने की बजाय भला बुरा बोला। भगवान ने कहा, पुण्डरीक आपने कोई न गलती की, न कोई भूल और न ही कोई अपराध। आप अपना कर्म कर रहे थे। माता पिता की सेवा से बड़ी न कोई पूजा है और न हि कोई धर्म। जो लोग सच्चे मन से अपने माता-पिता की सेवा करते हैं उन्हें मेरे द्वार आने की जरूरत नहीं होती। मैं खुद उनके द्वार पहुंचता हूं। इसलिए लोगों को चाहिए कि माता-पिता की सच्चे मन से सेवा जरूर करें। इसी तरह श्री शुकदेव जी के जन्म का वर्णन करते हुए उन्होंने परोपकार के महत्व को विस्तार से समझाया। इस बारे में उन्होंने श्रीरामचरितमानस से जटायु प्रसंग का उदाहरण दिया। कहाकि जटायु एक पक्षी था। मगर सीता जी को रावण से बचाने के लिए उसने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इसीलिए भगवान श्रीराम ने उस पक्षी को बैकुण्ठ धाम प्रदान किया। भगवान ने कहा कि जटायु मांस भक्षण करने वाला, कभी न तो यज्ञ किया, न तप और न हि कभी भगवान का नाम ही लिया। इसके बावजूद परोपकार के कारण भगवान ने उसे मोक्ष प्रदान किया। इसीलिए कहा भी गया है कि-
   परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
     परपीड़ा सम नहिं अघमाई।
कथा के मुख्य यजमान गणों में श्रीमती शमला मिश्र और गया प्रसाद मिश्र, श्रीमती सीता मिश्रा और रवि प्रसाद मिश्र और श्रीमती आशा मिश्रा तथा केशव प्रसाद मिश्र शामिल हैं। व्यवस्था का दायित्व बार एसोसिएशन रानीगंज के पूर्व अध्यक्ष अशोक कुमार मिश्र (पप्पू मिश्र) संभाल रहे हैं। कथा का समय  प्रतिदिन अपराह्न 3 बजे से शाम 7 बजे तक निर्धारित है। 20 अप्रैल को जबकि 21 महाप्रसाद का कार्यक्रम है।

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