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मत्था टेकते ही मुरादे होती है पूरी

प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। ऐतिहासिक चंद्रिका देवी धाम की मान्यता के पीछे कोई अंध विश्वास नहीं बल्कि उसका ठोस पौराणिक आधार है। यहां मत्था टेकने वाले श्रद्धालु की मुरादे पूरी होने में देर नहीं लगती। इसलिए तो यहां नवरात्र में भक्तो की भारी भीड़ उमड़ती है। जनपद मुख्यालय से करीब बीस किलोमीटर पश्चिम में प्रतापगढ़ अठेहा मुख्य सड़क मार्ग पर स्थित मां चण्डिका धाम जनपद की धार्मिक पहचान का एक अंग है। इस धाम का उल्लेख भागवत में भी मिलता है। जिसके अनुसार सई नदी का पूर्व नाम स्पंदिका के उत्तर भाग में इस धाम के मौजूद होने का उल्लेख है। देवी भागवत में ही यहां पर विद्यमान मां चन्द्रिका को मां पार्वती का विवाहित रूप माना गया है। इसीलिए यहां सिन्दूर आदि चढ़ता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण और जानकी के साथ इसी मार्ग से वनगमन किया था। वैसे यहां एक लोककथा प्रचलित है कि स्थानीय सण्डवा गांव की दो सगी बहने चण्द्रिका एवं कालिका जिन्हे देवी की सिद्धि प्राप्त थी। चन्द्रिका ने इस स्थान को अपना सिद्धिस्थल बनाया और पड़ोसी जिले सुल्तानपुर में दूसरी बहन कालिका के नाम से प्रसिद्ध है। चन्द्रिका की सिद्धि स्थली होने के कारण इस स्थल को चन्द्रिका धाम के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि यह मंदिर वैदिक काल का ही होगा। गर्भगृह पर बने मंदिर के दीवारो की चैहार्द एक मीटर से भी अधिक है। मंदिर चतुर्दिक बबूल के सघन जंगलो से घिरा है। पूर्व में जंगल के चारो तरफ सरोवर थे। जिसमें नरसिंह सरोवर, मैथला सरोवर की काफी मान्यता थी। वही वर्तमान में उनके महज अवशेष ही है। इसी तरह मेला क्षेत्र में 22 प्राचीन कूप है। इसमें देवकली की रानी जगेशर कुंवारि द्वारा बनवाया गया रानीकूप छोड़कर शेष जलहीन हो चुके है।

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प्रतापगढ़ (ब्यूरो)। ऐतिहासिक चंद्रिका देवी धाम की मान्यता के पीछे कोई अंध विश्वास नहीं बल्कि उसका ठोस पौराणिक आधार है। यहां मत्था टेकने वाले श्रद्धालु की मुरादे पूरी होने में देर नहीं लगती। इसलिए तो यहां नवरात्र में भक्तो की भारी भीड़ उमड़ती है। जनपद मुख्यालय से करीब बीस किलोमीटर पश्चिम में प्रतापगढ़ अठेहा मुख्य सड़क मार्ग पर स्थित मां चण्डिका धाम जनपद की धार्मिक पहचान का एक अंग है। इस धाम का उल्लेख भागवत में भी मिलता है। जिसके अनुसार सई नदी का पूर्व नाम स्पंदिका के उत्तर भाग में इस धाम के मौजूद होने का उल्लेख है। देवी भागवत में ही यहां पर विद्यमान मां चन्द्रिका को मां पार्वती का विवाहित रूप माना गया है। इसीलिए यहां सिन्दूर आदि चढ़ता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण और जानकी के साथ इसी मार्ग से वनगमन किया था। वैसे यहां एक लोककथा प्रचलित है कि स्थानीय सण्डवा गांव की दो सगी बहने चण्द्रिका एवं कालिका जिन्हे देवी की सिद्धि प्राप्त थी। चन्द्रिका ने इस स्थान को अपना सिद्धिस्थल बनाया और पड़ोसी जिले सुल्तानपुर में दूसरी बहन कालिका के नाम से प्रसिद्ध है। चन्द्रिका की सिद्धि स्थली होने के कारण इस स्थल को चन्द्रिका धाम के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि यह मंदिर वैदिक काल का ही होगा। गर्भगृह पर बने मंदिर के दीवारो की चैहार्द एक मीटर से भी अधिक है। मंदिर चतुर्दिक बबूल के सघन जंगलो से घिरा है। पूर्व में जंगल के चारो तरफ सरोवर थे। जिसमें नरसिंह सरोवर, मैथला सरोवर की काफी मान्यता थी। वही वर्तमान में उनके महज अवशेष ही है। इसी तरह मेला क्षेत्र में 22 प्राचीन कूप है। इसमें देवकली की रानी जगेशर कुंवारि द्वारा बनवाया गया रानीकूप छोड़कर शेष जलहीन हो चुके है।

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