नही कर सकेंगे चुनावी रैली,और न होगा भीड़ से सरोकार
कौशाम्बी। 27 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर प्रत्याशियों पर चुनाव आयोग का जिस प्रकार चाबुक चला है ,उससे विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशी चाहते हुए भी अपने मंसूबों को सफल नहीं बना सकेंगे ।साथ ही अपने भारी-भरकम प्रदर्शन या भीड़ से सरोकार करने के लिए तड़फड़ा कर रह जाएंगे । ज्ञात हो कि विधानसभा चुनाव को लेकर पूर्व में जिस प्रकार प्रत्याशियों द्वारा अपने धनबल और हैसियत का भी प्रदर्शन किया जाता था ,आए दिन जगह जगह पर भीड़ इकट्ठा करना ,सैकड़ों की संख्या में गांव में पहुंचना, यह उनकी दिनचर्या में शामिल हुआ करता था ।परंतु मौजूदा समय चुनाव आयोग का कोरोना रूपी चाबुक जिस प्रकार प्रत्याशियों पर चला है उससे प्रत्याशी अपने मंसूबों में चाहते हुए भी सफल नहीं हो पाएंगे। सूत्रों की माने तो चुनाव को लेकर जिस प्रकार प्रत्याशियों द्वारा फिजूलखर्ची की जाती थी साथ ही कागजों में जिस प्रकार पैसा पानी की तरह बहाया जाता था, चुनाव आयोग की बंदिशों के कारण यह सब प्रत्याशियों के सपनों की सोंच तक सीमित हो गया है । यह आयोग के चाबुक,का असर है या कोराना के डर का करिश्मा यह सवाल लोगों के जेहन में कौंध रहा है। चुनाव के इस महासंग्राम में जो शांति दिख रही है शायद हाल के दिनों की दशा देखकर इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। खैर जो भी हो लेकिन बात तो शतप्रतिशत सत्य है कि आयोग की कड़ाई व कोरोना की गाइड लाइन अपना जादू कर गई है। बता दे कि प्रदेश में छोटे से छोटा चुनाव भी बगैर तामझाम, बैनर,पोस्टर,होर्डिग के होने की कल्पना नहीं की जा सकती थी। चुनाव की घोषणा होते ही सियासी दलों के तामझाम बढ़ जाते थे। बड़े तो बड़े छोटे दल व निर्दल भी प्रचार.प्रसार में पीछे नहीं रहते थे। लाउड स्पीकर चिल्ला.चिल्लाकर प्रत्याशियों के नाम,उनके काम व चिह्न को बताते थे। एक से बढ़कर एक नारे लगाए जाते थे। बैनर,पोस्टर व होर्डिग की चहुंओर भरमार,बिल्ले पर्ची तो थोक के भाव मिल जाते थे। बताने की जरूरत नहीं पड़ती थी कि कौन लड़ रहा किस पार्टी से लड़ रहा है। प्रत्याशियों व उनके निशान बड़े तो दूर बच्चों के जुबान पर चढ़ जाते थे। घोषणा होते ही चुनावी बुखार लोगों के सिर चढ़ बोलने लगता था। ऐसे में जब कभी इस तरह की बात होती थी कि आयोग चाहे तो इन फिजूल खर्ची पर रोक लगा सकता है तब जानकार से जानकार लोग भी इसे कोरी कल्पना से अधिक नहीं मानते थे। अब जबकि आयोग ने इसे लेकर कड़ा रुख अपनाया तो चुनावी बुखार हवा हो चला है। आयोग के रुख का ही असर है कि लोगों पर चुनावी बुखार चढ़ नहीं रहा है। जिसके चलतें चुनावी महासमर में मतदाताओं पर चुनावी रंग चटख नहीं हो पा रहा है। ऐसे में यह अंदेशा लाजिमी है कि तमाम कवायद के बावजूद कहीं मतदान प्रतिशत पर इसका असर न पड़े। मतदान प्रतिशत बढ़ाने के उद्देश्य से तमाम कवायदें की जा रही है। आला अधिकारी तक इसे लेकर जागरूकता अभियान की कमान संभाल रखे है। बावजूद इसके आयोग की हनक के चलते चुनावी हवा बन नहीं पा रही है। जानकारों का मानना है कि भले ही आयोग का कदम सराहनीय हो लेकिन मतदान प्रतिशत गिरना तय है। मतदाताओं की बेरुखी क्या गुल खिलाती है,अधिकारियों का जागरूकता अभियान कितना रंग लाता है यह भी देखने वाली बात होगी। फिलहाल चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों के जेहन में जिस प्रकार का कानूनी रूपी जादू छोड़ दिया है वह आम जनता के लिए संजीवनी की भांति काम कर रहा है। वही चुनाव जीतकर पूरे कार्यकाल जनता के बीच से कोई सरोकार न करने वाले और चुनावी बयार आते ही जनता की नींद हराम करने वाले ऐसे नेताओं को चुनाव आयोग ने कानूनी जंजीरों की बन्दिशों में इस प्रकार जकड़ कर रख दिया है कि सब कुछ चाहते हुए भी वह अपने धनबल, वैभव व हैसियत का प्रदर्शन करने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाएंगे ।चुनाव आयोग के इस चाबुक से जहां एक ओर राज्य की करेंसी का पूरी तरह दुरुपयोग रोका जा सका है वहीं दूसरी ओर जनता की नींद व समय बर्बाद करने वाले प्रत्याशियों को पूरी तरह से कानून के शिकंजे में कस कर रख दिया गया है।



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