प्रतापगढ । पूज्य पितृ स्मृति में आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं। श्रद्धया इदं श्राद्धम् अर्थात जो श्र्द्धा से किया जाय, वह श्राद्ध है।सनातन धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। *शिक्षक पं० उमाकान्त त्रिपाठी के पूज्य पिताजी की स्मृति में बाबा बेलखरनाथ धाम क्षेत्र के ग्राम गोंई में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह में यह विचार उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह “मोती सिंह” ने मुख्य अतिथि के तौर पर ब्यक्त किया। आचार्य नरेन्द्र जी ने संस्कृति के सम्बन्ध में धाराप्रवाह संस्कृत में वक्तव्य दिया, जिसकी सभी ने प्रशंसा की। विशिष्ट अतिथि रानीगंज विधायक अभय कुमार जी ” धीरज ओझा* ” ने कहा कि धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है।
प्राथमिक शि०सं० जिला उपाध्यक्ष सत्य प्रकाश पाण्डेय जी ने कहा कि पिता श्री एवं माताजी की सेवा और पितामह एवं पूर्वजों को श्रद्धांजलि देकर मौजूदा पीढ़ी काफी सीख ले सकती है। राष्ट्रीय शैक्षिक जिलाध्यक्ष अशोक राय ने शिक्षक सम्मान समारोह में कहा कि यह आयोजन पुत्र को पितृ ऋण से उऋण कर देती है। पूर्व मा०शि० कोषाध्यक्ष विजय दूबे ने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों में हम अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी इच्छानुसार सेवा करते हैं। विशिष्ट जिलाध्यक्ष एंव बेलखरनाथ धाम के शिक्षक डा०विनोद त्रिपाठी ने विद्वत सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि आदर्श के तौर पर पिता के महात्म्य में राजा दशरथ और पुत्र श्री राम चन्द्र जी सर्व प्रथम आते है। मुगल शासक बाबर एवं हुमायूँ, आधुनिक भारत में बैरिस्टर मोती लाल नेहरू एवं पं जवाहरलाल नेहरू आदि की मिसाल दी जाती है। सत्य मेव के तौर पर कहा जाय तो माता पिता ही धरती पर प्रत्यक्ष देवी देवता स्वरूप होते हैं। अयोध्या, वाराणसी और मथुरा वृन्दावन से पधारे और संस्कृत विद्वानों की विद्वत सभा के अनुसार* मान्यता है कि ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुन्दर वर्णन पुराणों में मिलता है कि सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर प्रिय के अतिरेक की अवस्था ही “प्रेत”योनि है , क्योंकि आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है तब भी उसके अन्दर मोह, माया ,भूख और प्यास का अतिरेक होता है। शिक्षक सम्मान समारोह में विधायक धीरज ओझा जी ने 21 वरिष्ठ शिक्षकों को अंगवस्त्रम् , नारियल एवं पुस्तक भेंटकर सम्मानित किया*। इस मौके पर ब्लॉक प्रमुख शिवगढ़ सत्यम ओझा, प्रतिनिधि नीरज ओझा, बेलखरनाथ ब्लॉक प्रमुख सुशील सिंह, विजय मिश्र मंत्री, ललित मिश्र सरस, सुशील दूबे एवं पवन मौर्य आदि सैकड़ों शिक्षक गण मौजूद रहे।



उत्तरप्रदेश








शेयर करें




































































