प्रयागराज। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज द्वारा हिन्दी पखवाड़ा के अन्तर्गत हिन्दी विषयक में डाॅ॰ धनन्जय चोपड़ा ने कहा कि हिन्दी भाषा वर्तमान समय में वैश्विक संचार में आगे बढ़ रही है, ऐसी स्थिति में हमें अपने शब्दों की क्षमता को पहचानने एवं परिमार्जन करने की आवश्यकता है। हिन्दी 90 प्रतिशत की दर से इन्टरनेट पर बढ़ रही हैं। हिन्दी के प्रति बढ़ते लगाव का परिणाम है कि भारत वर्ष के बाहर विदेशों में लगभग दौ सौ विश्वविद्यालयों में हिन्दी का पठन-पाठन का कार्य किया जा रहा है। वैश्विक स्तर पर लगभग 25 प्रतिशत से अधिक हिन्दी पत्रिकाओं के प्रकाशन हो रहे हंै। आज हिन्दी में जन इतिहास लिखने का कार्य हो रहा है जो इतना पहले कभी नहीं हुआ। भाषा और संस्कृति एक दूसरे की पूरक है, हिन्दी के जिंगल अंग्रेजी से अधिक प्रभावी सिद्ध हो रहे हंै। शब्द तभी तक कठिन होता है जब तक हम उससे जुड़े नहीं होते। शब्द संघर्ष को विशेष रूप से समझने की आवश्यकता है। रेडियों में चित्र खींचना पड़ता है लेकिन टेलीवीजन में अलग तरह से बोलना पड़ता है। यदि सही मायने में देखें तो प्रधानमंत्री जन संचार में सबसे आगे हैं, अर्थात यह तथ्य स्वीकार करने योग्य है कि प्रधानमंत्री इस समय के सबसे बड़े संचारी हैं। हिन्दी शब्दों की एक बड़ी विरासत है, विजुअल हमारे आदिकाल के समय से है, हमने तो सिर्फ टेक्नालाजी में समाहित कर दिया। हिन्दी शब्दों की एक बड़ी श्रृंखला है जो हमें विरासत में मिली है, जिस पर हम सभी को गर्व होना चाहिए।
केन्द्र निदेशक, प्रो0 सुरेश शर्मा, ने अपने सम्बोधन में कहा कि हम अपनी बात को सम्प्रेषित करने का कार्य ध्वनि के माध्यम से करते हैं। आदिकाल में कोई भाषा नहीं थी, खेती-बारी जैसे कार्यों से अनभिज्ञ थे, सिर्फ शिकार करना जानते थे। शिकार के बाद भोजन बनाते समय शारीरिक बनावटों के माध्यम से भाषा का प्रयोग करते थे। सही मायने में देखें तो मुख से निकलने वाली ध्वनियों की ताकत नाभी से प्राप्त होती है। अतः हमें सहर्ष स्वीका करना चाहिए कि भाषा हमारी प्राण वायु है। कार्यक्रम का संचालन शील द्विवेदी द्वारा कुशलता पूर्वक किया गया।



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