लक्ष्य हासिल करने के लिए मेहनत से ज्यादा जुनून जरूरी: अजय कुमार सरोज
प्रयागराज। चीन में आयोजित एशियन गेम्स में 1500 मीटर दौड़ में रजत पदक जीतकर भारत का तिरंगा लहराने वाले अजय कुमार सरोज का सोमवार को प्रयागराज पहुंचने पर जोरदार स्वागत किया गया। खिलाड़ियों और प्रशंसकों ने फूल मालाओं से लाद दिया। इसके बाद मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में अजय का स्वागत किया गया। अजय सरोज ने कहा कि मंजिल पाने के लिए मेहनत से ज्यादा पागलपंती जरूरी होती है। लक्ष्य के प्रति जुनून ही खिलाड़ी को उसके मुकाम तक पहुंचाता है। नए खिलाड़ियों से कहा कि मेहनत के साथ ही अपने कोच पर आंख मूंदकर विश्वास करें। कोच ही वह मार्गदर्शक है जिसके सहारे आप अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। अपने से कोई कदम न उठाएं। कोच के दिशा निर्देश पर ही आगे बढ़ें। अपना दिमाग बिल्कुल नहीं लगाना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास करने के साथ ही कोच पर भी विश्वास करें। पूरी ईमानदारी से मेहनत करने पर शत प्रतिशत सफलता मिलेगी।
अजय सरोज ने कहा कि उन्होंने कड़ी मेहनत और लगन के बाद यह सफलता हासिल की है। इसमें उनके कोच के साथ परिवार और भाई का जो योगदान है उसे वह कभी भुला नहीं पाएंगे। परिवार ने कष्ट सहते हुए उनको आगे बढ़ाने का कार्य किया है। एशियन गेम्स का पदक वह अपने परिवार को माता-पिता और परिवार को समर्पित कर रहे हैं। एशियाड के लिए वह 2009 से तैयारी कर रहे हैं। 15 वर्ष के बाद उन्हें सफलता मिली है। लगातार वह प्रशिक्षण पर चल रहे थे। ओलंपिक में रैंकिंग के आधार पर उनका चयन हो जाना चाहिए। ओलंपिक के लिए भी पदक जीतने की वह तैयारी कर रहे हैं। इस मौके पर सोरांव के पूर्व विधायक और अपना दल एस के राष्ट्रीय महासचिव जमुना प्रसाद सरोज, क्रीड़ा अधिकारी विमला सिंह, प्रयागराज एथलेटिक्स एसोसिएशन के संयुक्त सचिव सत्येंद्र सिंह आदि मौजूद रहे। इसके पूर्व प्रयागराज जंक्शन पर पहुंचने पर अजय का ढोल नगाड़ों के साथ जोरदार स्वागत किया गया।
बता दें कि 1500 मीटर की दौड़ में अजय का प्रदर्शन बेहद उम्दा रहा। एक समय लगा कि वह स्वर्ण पदक भी जीत सकते हैं। आखिर में उनकी झोली में सिल्वर आया। अजय ने अपनी दौड़ 3:38.94 के समय में पूरी की। अजय के पिता धर्मराज प्लम्बरिंग का काम करते हैं। उनके पांचों बच्चे धावक हैं। पिता की इच्छा पर अजय के भाई अजीत ने सबसे पहले दौड़ना शुरू किया। पिता चाहते थे कि उनका बेटा सेना में जाए। अजीत ने जब एथलेटिक्स में राष्ट्रीय स्तर तक की स्पर्धा में मेडल जीता तो पिता की ख्वाहिश हुई कि बेटा देश के लिए पदक जीते।



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